झांसी। बाबूलाल तिवारी जिन्हें झांसी के लोग प्यार से दाऊ कहकर बुलाते थे। दाऊ यानी बड़े भाई। ईमानदारी तो ऐसी कि आज भी लोग उनकी मिसाल देते हैं। सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी उन्हें झांसी सदर से विधायक का चुनाव लड़ाना चाहती थीं, प्रदेश नेतृत्व ने उन्हें अवगत कराया तो दाऊ ने अपने आर्थिक अभावों का हवाला देकर चुनाव लड़ने से मना कर दिया। इसकी भनक जब झांसी के कांग्रेस कार्यकर्ताओं व अन्य लोगों को लगी तो उन्होंने बाबूलाल तिवारी के घर पर पहुंचकर उन्हें भरोसा दिलाया कि आप चुनाव लड़ें, चुनाव में जो भी खर्च होगा कांग्रेस के कार्यकर्ता व शहर के लोग लगाएंगे। हुआ भी ऐसा ही। चुनाव प्रचार से लेकर खाने- पीने के इंतजाम तक सब जनता ने किया और बाबूलाल तिवारी ने अपने प्रतिद्वंद्वियों को लंबे अंतर से हराया। एक छोटे से घर में रहकर सिर्फ दो जोड़ी कुर्ता पायजामा में साधारण सी जिंदगी जीने वाले बाबूलाल तिवारी को पता भी नहीं चला कि वह कब विधायक बन गए।
विधायक बनने के बाद भी दाऊ इतने सरल और सहज रहे कि कभी भी किसी भी चायपान की दुकान या बाजार में घूमते हुए लोगों को उपलब्ध हो जाते थे। एक बार नगर पालिका अध्यक्ष और एक बार विधायक रहने के बाद भी अंतिम समय तक उनके आर्थिक हालातों में कोई बदलाव नहीं आया। झांसी की सियासत में उनकी ईमानदारी और जनता के प्रति सेवा और समर्पण के किस्से आज भी सुनाए जाते हैं। उनके परिवार के ही सुरेश चंद्र तिवारी बताते हैं जब दाऊ ने चुनाव लड़ा तो एक नारा खूब चला था, मौं न देखो काऊ का जिता कै भेजो दाऊ खौं।