झांसी। कोरोना काल में खड़ी हुईं प्राइवेट बसें एक साल बाद भी सड़क पर नहीं आईं हैं। संचालकों का कहना है कि सवारियां कम आ रहीं हैं जिससे खर्च नहीं निकल पाता। डीजल के दामों में भी लगातार इजाफा हो रहा है। हालात यह हैं कि कई प्राइवेट रूटों पर बसों की संख्या कम होने से लोगों को भारी दिक्कत हो रही है।
वर्ष 2020 के मार्च से पहले झांसी में कुल 300 निजी बसों का संचालन होता था। इनमें करीब 80 बसों का अंतर प्रांतीय स्तर पर संचालन होता था। 22 मार्च 2020 से बसों का संचालन पूरी तरह बंद हो गया। संक्रमण का असर समाप्त होने के बाद प्रदेश के लिए यहां से बसों का संचालन शुरू तो हुआ लेकिन नुकसान को देखते हुए 150 बस संचालकों ने परमिट सरेंडर कर दिया था। तब से अब तक किसी भी बस का परमिट नहीं उठाया गया। प्राइवेट बस यूनियन के कार्यालय अधीक्षक गौरी शंकर सोनी ने बताया कि परमिट नवीनीकरण में प्रदेश के अंदर टैक्स और बीमा मिलाकर प्रतिमाह न्यूनतम साढ़े 10 हजार रुपये तथा अंतर प्रांतीय के लिए करीब 14 हजार रुपये प्रतिमाह जमा करने पड़ेंगे जबकि सवारियां बहुत कम निकल रही हैं। स्थिति यह है कि जो बसें चल रही हैं उनमें भी सवारियां नहीं बैठ रही हैं। ऐसे में परमिट का नवीनीकरण कराना घाटे का सौदा होगा।
टैक्स में भी सरकार नहीं दे रही छूट
प्रदेश सरकार द्वारा बंद बसों को संचालन के लिए टैक्स में छूट न देना भी नवीनीकरण न कराए जाने का प्रमुख कारण है। एमपी में पिछले वर्ष साढ़े पांच महीने की तथा इस वर्ष भी साढ़े पांच महीने टैक्स में छूट दी है। गुजरात बस संचालकों को छह महीने टैक्स में छूट दी है लेकिन यूपी में पिछले वर्ष सरकार ने छह माह बीत जाने के बाद दो महीने टैक्स में छूट दी लेकिन इस वर्ष अभी तक कोई छूट नहीं दी है। इसी प्रकार पिछले एक वर्ष में डीजल के दामों डेढ़ गुना वृृद्धि हुई है। प्रदेश सरकार अन्य राज्यों की तरह यहां भी छूट देती तो कुछ बसों के परमिटों का नवीनीकरण कराया जा सकता है।
अनूप कुमार यादव
अध्यक्ष, प्राइवेट बस यूनियन, झांसी