झांसी । स्वतंत्रता संग्राम में शहादत देने वाली चौदह वीरांगनाओं के बलिदान की साक्षी झांसी जिले की गढ़वई की गढ़ी अपना अस्तित्व खोने के कगार पर है। 1859 में इसी गढ़ी में क्रांतिकारी एक बैठक कर रहे थे इसी दौरान अंग्रेज अफसर मेजर मीड ने अंग्रेजी सेना भेजकर इस गढ़ी पर हमला कर दिया था। चार दिन तक तोपों से चली गोलाबारी में गढ़ी का भारी नुकसान हुआ था। क्रांतिकारियों को तो किसी तरह भसनेह के जागीरदार निरंजन सिंह ने पीछे के दरवाजे से निकाल दिया था, पर बाद में गढ़वई की जनता अपने जागीरजदार के साथ अंग्रेज सैनिकों से लड़ती रही थी, इसमें पुरुषों के अलावा चौदह वीरांगनाएं तथा उनके साथ आए 23 नौनिहाल बच्चे भी शहीद हो गए थे। इस गढ़ी का निर्माण 1584 में ओरछा के बुंदेला शासकों के वंशजों ने कराया था।
शहीद स्मारक के रूप में किया जाए विकसित
गढ़वई निवासी दिनेश तिवारी बताते हैं कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद अधिकांश देशी रियासतें अंग्रेजों की पिट्ठू बन गईं थीं। झांसी को छोड़कर दो चार छोटे जागीरदार थे जो आजादी की लड़ाई की अलख जगाए हुए थे। इन्हें में से एक थे भसनेह के जागीरदार निरंजन सिंह बुंदेला। इनकी गढ़वई ग़ढी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का प्रमुख केंद्र थी। बात है 30 जून 1859 की दो सौ क्रांतिकारियों का एक जत्था इस क्षेत्र से निकल रहा था, उसने भसनेह के जागीरदार निरंजन सिंह को खबर भेजी कि वह गढ़वई गढ़ी में ठहरकर आसपास के क्रांतिकारियों के साथ बैठक करना चाहते हैं। निरंजन सिंह ने सारी व्यवस्था कर दीं, इसी दौरान किसी मुखबिर ने अंग्रेज अफसर को सूचना दे दी तथा अंग्रेज सैनिकों ने गढ़ी पर धावा बोल दिया था। निरंजन सिंह ने क्रांतिकारियों के जत्थे को तो किसी तरह पीछे के दरवाजे से निकाल दिया था, पर गढ़वई की जनता अपने जागीरदार के साथ अंग्रेज सेना की तोपों के गोलों के सामने लड़ाई लड़ती रही थी। आजादी की लड़ाई में एक बड़ा योगदान देने वाली वीरांगनाओं की शहादत की साक्षी इस गढी की ओर सरकार का ध्यान नहीं है। इसे शहीदों के स्मारक के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।
वीरांगनाओं के बलिदान की गाथा की लगाई जाए पट्टिका
गढ़वई के ग्राम प्रधान पुष्पेंद्र पटेल बताते हैं कि गढ़वई की गढ़ी प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का दूसरा सबसे बड़ा केंद्र रही है। भसनेह के जागीरदार निरंजन सिंह का स्वयं का भी स्वतंत्रता आंदोलन में अविस्मरणीय योगदान रहा है। उनकी गढ़वई की गढ़ी में अधिकांश क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन होता रहता था। इस बात की खबर अंग्रेज अफसरों को भी रहती थी। आजादी की अलख जगाने वाली इस गढ़ी को न केवल पुरातात्विक स्थल के रूप में बल्कि आजादी की लड़ाई में शहीद होने वाली वीरांगनाओं के शहादत स्थल के रूप में सरकार को विकसित करना चाहिए। गढ़ी की देखरेख करने के साथ ही यहां पर एक शिला पट्टिका लगाकर वीरांगनाओं के आजादी की लड़ाई में किए गए योगदान का उल्लेख किया जाना चाहिए। पर, अब तक सरकार और उसके नुमाइंदों ने आजादी की लड़ाई की साक्षी इस गढ़ी की ओर कोई ध्यान नहीं दिया है जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है।