फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अमर उजाला अभियान: रोते-रोते आने वाले बच्चे अब हंसते-हंसते आते हैं

विज्ञापन
विज्ञापन
झांसी। कोरोना को मात देकर जब दो वर्षों बाद स्कूल दोबोरा शुरू हुए तो बच्चों की स्थिति काफी खराब हो गई थी। बच्चे स्कूल या तो आते नहीं थे या फिर रोते-रोते आया करते थे। ऐसे में स्कूलों में शिक्षकों ने धीरे-धीरे बच्चों को अच्छा माहौल देकर उनकी मनोस्थिति बदल दी। अब वही बच्चे स्कूल हंसते-हंसते आते हैं।
विज्ञापन

कोरोना काल में जब स्कूल बंद हुए थे तो ज्यादातर लोग मोबाइल और टीवी तक ही सीमित हो गए थे। इस कारण उनकी मनोस्थिति भी काफी खराब हो गई थी। बच्चे पढ़ाई और अनुशासन भूलने लगे थे, उनको पढ़ाई रास नहीं आती थी। वहीं इस स्थिति में स्कूल प्रशासन भी बच्चों की स्थिति से काफी परेशान था। बच्चे स्कूल में रोते-रोते आया करते थे।
छोटी कक्षा में तो हालात यह रहे कि बच्चों ने प्रवेश लेने के दो वर्षों तक अपने शिक्षकों को सिर्फ मोबाइल में ही देखा था, आमने-सामने विद्यार्थी और शिक्षकों का सामंजस्य ही नहीं बन पाया था। इसके कारण बच्चे स्कूल में असहज महसूस कर रहे थे। धीरे-धीरे शिक्षकों ने बच्चों के साथ बातचीत करके उनको कक्षा में सहज महसूस करवाया। बच्चों को समय-समय पर गेम्स और अन्य क्रियाकलाप करवाकर से उनको खुद से जोड़ना शुरू किया। हालांकि अभी भी उनके साथ कुछ समय और इसी तरह मेहनत करने की आवश्यकता है।
विज्ञापन

शुरू में तो बच्चे रोते-रोेते स्कूल आया करते थे लेकिन स्थिति सामान्य होने के साथ बच्चे भी सामान्य हो गए हैं। - निहारिका चावला, शिक्षिका वुड्स हैरिटेज
परीक्षा के समय खुद बैठकर बच्चों को पढ़ाया था, लेकिन स्कूल का माहौल अलग होता है, वहां अनुशासन होता है। - कमलेश राय, अभिभावक, आवास विकास
ऑनलाइन क्लास में पढ़ते थे लेकिन मजा नहीं आता था, ऑफलाइन क्लास में पढ़ने में ज्यादा अच्छा लगता था। - स्पर्श सक्सेना, विद्यार्थी ब्लू बेल्स
ऑनलाइन कक्षाओं में बच्चों के साथ सामंजस्य नहीं बन पाता था, बच्चों के चेहरे दिखते नहीं थे, ऑफलाइन में बच्चों को पढ़ाने में भी मजा आता है। -चरणजीत कौर, शिक्षिका ब्लू बेल्स
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें