झांसी। झांसी में थैलेसीमिया के 150 मरीज हैं। इसमें 11 और 13 साल की दो सगी बहनें भी हैं। इस बीमारी में मरीजों का खून कम होने लगता है, इस कारण उन्हें बार-बार ब्लड चढ़ाना पड़ता है। किसी मरीज को हर सप्ताह तो किसी को हर महीने खून चढ़ाया जाता है। 57 मरीज मेडिकल कॉलेज के ब्लड बैंक में खून चढ़वाने आते हैं।
थैलेसीमिया बच्चों को उनके माता-पिता से मिलने वाला अनुवांशिक रक्त रोग है। इस रोग की पहचान बच्चे में तीन महीने बाद हो पाती है। आमतौर पर हर सामान्य व्यक्ति के शरीर में लाल रक्त कणों की उम्र करीब 120 दिन होती है लेकिन थैलेसीमिया से पीड़ित रोगी के शरीर में लाल रक्त कणों की उम्र घटकर सिर्फ 20 दिन ही रह जाती है। इसका सीधा असर व्यक्ति के हीमोग्लोबिन पर पड़ता है, जिसके कम होने पर व्यक्ति एनीमिया का शिकार हो जाता है और हर समय किसी न किसी बीमारी से ग्रसित रहने लगता है।
सही इलाज न मिलने पर मृत्यु तक हो सकती है। झांसी में अभी थैलेसीमिया के 150 मरीज हैं। इनमें से 57 तो नियमित मेडिकल कॉलेज में ही रक्त बदलवाने के लिए आते हैं। बाकी, निजी ब्लड बैंक या फिर दूसरे महानगरों में रक्त बदलवाने के लिए जाते हैं।
निगेटिव ग्रुप वालों को ढूंढना पड़ता डोनर
थैलेसीमिया का शिकार निगेटिव ब्लड ग्रुप वालों को सबसे ज्यादा रक्त को लेकर दिक्कत होती है। अक्सर ब्लड बैंकों में निगेटिव ग्रुप का ब्लड नहीं होता है। फिर मरीजों के लिए डोनर ढूंढना पड़ता है। ऐसे में मरीज को रक्त भी आसानी से नहीं मिल पाता है।
दो तरह का होता थैलेसीमिया
मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. ओमशंकर चौरसिया ने बताया कि थैलेसीमिया दो तरह का होता है, माइनर और मेजर। किसी महिला या फिर पुरुष के शरीर में मौजूद क्रोमोजोम खराब होने पर बच्चा माइनर थैलेसीमिया का शिकार बनता है लेकिन अगर महिला और पुरुष दोनों के क्रोमोजोम खराब हो जाते हैं तो ये मेजर थैलेसीमिया की स्थिति बनता है। इसकी वजह से बच्चे के जन्म लेने के छह महीने बाद उसके शरीर में खून बनना बंद हो जाता है। उसे बार-बार खून चढ़वाने की जरूरत पड़ने लगती है।
मेडिकल कॉलेज में 57 थैलेसीमिया रोगियों को समय-समय पर रक्त चढ़ता है। इसमें दो सगी बहनें भी शामिल हैं। जिनकी उम्र 11 और 13 साल है। किसी मरीज को हर सप्ताह तो किसी को महीने-दो महीने में रक्त चढ़ता है।
डॉ. एमएल आर्या, ब्लड बैंक प्रभारी, मेडिकल कॉलेज।