जौनपुर। एक तरफ सरकार एक जिला एक उत्पाद के तहत वहां के स्थानीय उत्पाद को बढ़ावा दे रही है, वहीं कभी जनपद की पहचान रहे इत्र, चमेली का तेल, तिल व तिल्ली के तेल का उद्योग दम तोड़ रहा हैं। वजह कि मेहनत के बाद भी तिल की सही कीमत या मुनाफा न मिलने से उद्योग भी बंदी के कगार पर है। लगभग 15 साल पहले तिल का लगभग 70 टन उत्पादन होता था जो अब सिमट कर 2.52 क्विंटल पर आ गया। पहले जहां देश के कोने-कोने में इसकी आपूर्ति होती थी अब महज वाराणसी व बिहार तक खपत होती है। जिले में एक जिला एक उत्पाद के तहत ऊनी दरी का चयन किया गया है, अगर जिम्मेदारों का इस ओर ध्यान आकृष्ट करें और पेशे से जुड़े लोगों की सुधि करते हुए ब्रांडिंग की जाए तो एक बार फिर यह अपनी पहचान प्राप्त कर सकेगा।
वर्तमान में केवल बलुआघाट के कुछ लोग ही किसानों से तिल खरीदकर गोमती नदी के किनारे सफाई करते हैं। करीब 20 परिवार में 60 से 70 सदस्य होंगे जो तिल धुलाई के कार्य में लगे हैं। साथ ही व्यापारियों से तिल खरीदकर उसकी एक हजार रुपये प्रति बोरे की धुलाई करते है। प्रत्येक बोरी में परिवार के पांच सदस्य होते हैं, इसमें करीब 18 घंटे का समय लगता है। इसमें सबसे पहले हौदा में भिगोकर 12 बजे रात से सुबह सात बजे तक कुटाई करते हैं। पहले इसको फरियाते हैं, फिर सूखाते हैं और फिर ओसाते हैं। इसमें भूसी-तिल्ली अलग हो जाती है। एक क्विंटल की बोरी में 20 किलो गंदगी व भूसी निकल जाती है। इस व्यापार से जुड़े जगमेंद्र निषाद व अशोक कुमार ने बताया कि तिल की सफाई कार्य में पिता जमुना प्रसाद, दादा छेदीलाल निषाद, परदादा सुमेर निषाद लगे थे। बताया कि वर्तमान में तिल की सफाई होने के बाद इसको वाराणसी की मंडी व बिहार भेजा जाता है। अब सफाई के लिए मिलों का सहारा लिया जा रहा है। अब इसका उपयोग मकर संक्रांति आने पर ज्यादातर सामग्रियों में किया जाता है। तेल कम ही निकाला जा रहा है।
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इन क्षेत्रों में होती हैं तिल की खेती :-
रामपुर, जमालापुर, बदलापुर, मल्हनी, केराकत, शाहगंज में तिल की अच्छी खेती होती है। यह ऐसी खेती है जहां कुछ न होता हो ढलान पर तिल की खेती की जा सकती है। इनकी जड़ों में पानी नहीं लगना चाहिए। इसकी खेती सितंबर से नवंबर तक होती है।
अब गिनती के बचे लकड़ी के कोल्हू
तिली के तेल के लिए 30 वर्ष पहले जिले में में करीब लकड़ी का कोल्हू 200 से 300 की संख्या में हुआ करती थी। जिससे तिल के तेल की पेराई की जाती थी। अब इसकी संख्या करीब 10 रह गई है। इसमें कुछ ही जगहों जैसे मधारे टोला, सब्जी मंडी बाजार में ही इसका कारोबार देखने को मिलता है। व्यवसाय से जुड़े शिवशंकर साहू बताते है कि करीब 30 वर्ष पहले यह तिल्ली का तेल देश के कोने-कोने में जाता था। यह व्यापार करीब 100 साल से भी पुराना है।
किसी भी उद्योग को बढ़ावा देने के लिए ऋण जिला प्रशासन की तरफ उपलब्ध करवाया जाता है। इसके लिए उद्योग व एनआरएलएम विभाग काम कर रहा है। एक जिला एक उत्पाद के तहत ऊनी दरी का चयन पांच साल पहले ही किया जा चुका है, ऐसे में तिल उद्योग के बेहतरी के लिए बैठक कर उद्योग विभाग से सुझाव मांगे जाएंगे। जिससे इतने पुराने उद्योग को फिर से जिंदा किया जा सके।
अनुज कुमार झा, जिलाधिकारी।
खेती किसानी के लिए हमेशा किसानों को प्रोत्साहित किया जाता है। बीज उत्पादन से लेकर हर कार्य तेजी से किया जा रहा है। चमेली की खेती काफरपुर में कराई जा रही है। ऐसे में तिल उद्योग को भी बढ़ावा देने के लिए कृषि विभाग व प्रशासन से बात की जाएगी।
गिरीशचंद्र यादव, राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार, खेल एवं युवा कल्याण।