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जान जोखिम में डालकर काम करने को विवश हैं रोडवेज कर्मी

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जौनपुर रोडवेज डिपो के तकरीबन 50 कर्मचारी जान जोखिम में डाल कर काम करने को विवश हैं। जर्जर हो चुके वर्कशाप के भवन में कर्मचारी बसों की मरम्मत का कार्य कर रहे हैं, जबकि वर्कशाप का भवन जर्जर हो चुका है। जो कभी भी गिर सकता है।
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जौनपुर रोडवेज डिपो से कुल 85 बसों का संचालन होता है। इन बसों का संचालन दिल्ली, लखनऊ, वाराणसी, प्रयागराज, गोरखपुर, आजमगढ़, सुल्तानपुर आदि स्थानों के लिए होता है। इन बसों के संचालन से प्रतिदिन नौ से 10 लाख रुपये की आय होती है। इन बसों के खराब हो जाने पर मरम्मत के लिए रोडवेज परिसर में ही वर्कशाप है। इसमें लगभग 50 कर्मचारी बसों की मरम्मत आदि का कार्य करते हैं। इनमें परमानेंट और संविदा दोनों कर्मचारी शामिल हैं। इन कर्मचारियों की सुरक्षा के मद्देनजर कोई उपाय नहीं किए गए हैं। हालत यह है कि वर्कशाप भवन पूरी तरह जर्जर हो चुका है। दीवारों में दरारें पड़ी हुई हैं। वर्कशाप में लगा टिन शेड भी पुराना हो गया है। टिन शेड जगह-जगह टूटा हुआ है, जो कभी भी गिर सकता है। इससे हादसा होने की आशंका बनी रहती है। इसके बावजूद कर्मचारी जर्जर वर्कशाप भवन में काम करने को विवश हैं। रोडवेज वर्कशाप के सीनियर फोर मैन शिवधनी यादव का कहना है कि वर्कशाप के जर्जर भवन के मरम्मत के लिए एआरएम की ओर से निदेशालय पत्र भेजा गया है। निदेशालय से स्वीकृति मिलते ही वर्कशाप की मरम्मत का काम करा दिया जाएगा। निदेशालय में सरेंडर बसों को मुक्त करने के लिए भी पत्र भेजा गया है। बसें नहीं आने से डिपो को डेढ़ से दो लाख रुपये घाटा हो रहा है।
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निदेशालय सरेंडर हैं 15 बसें
जौनपुर। स्थानीय रोडवेज डिपो से संचालित होने वाली 15 बसें अभी भी निदेशालय में सरेंडर हैं। इन बसों को पिछले साल कोरोना संक्रमण काल के दौरान अप्रैल माह में निदेशालय में सरेंडर किया गया था। जो अभी तक डिपो को नहीं मिल पाई हैं। इससे डिपो को डेढ़ से दो लाख रुपये का घाटा हो रहा है। इस समय मात्र 70 बसों का संचालन हो रहा है।
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