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दस साल में बनकर तैयार हुआ था हिंदी भवन

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हिन्दी भवन के संस्थापक बाबू रामेश्वर प्रसाद की प्रतिमा। संवाद - फोटो : JAUNPUR
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जौनपुर। स्वराज के सपने के साथ अपनी भाषा का भी गहरा रिश्ता है। हिंदी भवन की स्थापना इसी मकसद से हुई थी। देश की आजादी की लड़ाई लड़ने वाले बाबू रामेश्वर प्रसाद ने 1947 में देश की आजादी के समय ही मातृ भाषा हिंदी के संवर्धन के लिए एक संस्था बनाने का संकल्प लिया तो उनके पास न धन था न जमीन। अलबत्ता पक्का इरादा जरूरत था। उनके इरादे को देखते हुए देश के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने भी चंदा दिया था। जिले की सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियों के केंद्र हिंदी भवन के तिलक पुस्तकालय से कोई भी दो रुपये महीने की दर से किताबें लेकर पढ़ सकता है।
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बाबू रामेश्वर प्रसाद आजादी की लड़ाई के रणबांकुरे तो थे ही साहित्यकार और पत्रकार भी थे। 31 अगस्त 1924 को उन्होंने जौनपुर में हिंदी साहित्य सम्मेलन नामक संस्था, सेवा प्रेस की स्थापना की। समय अखबार निकाला। समय के पहले पेज पर एक प्रतिनिधि कविता छपती थी। उन्होंने देश की आजादी कुछ महीने पहले 4 जून 1947 को हिंदी भवन निर्माण का संकल्प लिया। तब जौनपुर के राजा यादवेंद्र दत्त दुबे ने हिंदी भवन के लिए जमीन दी। अब निर्माण की समस्या थी तो देश भर से चंदा मांगा गया। देश प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने उस वक्त ढाई सौ रुपये का सहयोग किया था। जौनपुर, कोलकाता, मुंबई के व्यापारियों ने भी इस काम में सहयोग किया। 19 अप्रैल 1951 में डॉ संपूर्णानंद ने हिंदी भवन का शिलान्यास किया। रामेश्वर प्रसाद के पुत्र अजय सिंह बताते हैं कि 9 फरवरी 1961 को हिंदी भवन का लोकार्पण हुआ। यहां आठ कमरों का अतिथि गृह है जिसके किराए से कर्मचारियों का वेतन, बिजली और पानी का खर्च निकलता है।
हिंदी भवन की स्थापना का मकसद हिंदी का विकास और देवनागरी लिपी का संवर्धन था। इसके लिए नाटक, काव्य गोष्ठी, व्याख्यान आदि का आयोजन किया जाता था। वर्ष 1920 में स्थापित तिलक पुस्तकालय को भी इसी भवन में स्थानांतरित कर दिया गया। यहां 70 हजार पुस्तकें हैं। वाचनालय में बैठकर कोई भी दिन भर पुस्तकें पढ़ सकता है। पुस्तकें घर ले जाने के लिए दो रुपये महीने का शुल्क देना पड़ता है और धरोहर राशि के रूप में दो सौ रुपये जमा करने होते हैं। हिंदी भवन और पुस्तकालय से तमाम दिग्गजों का जुड़ाव रहा है। हिंदी साहित्य सम्मेलन जौनपुर के पूर्व अध्यक्ष डॉ पीसी विश्वकर्मा बताते हैं कि हिंदी के संवर्धन के लिए ऐसी आलीशान इमारत किसी जिले में शायद ही मिले। हिंदी भवन में हर महीने कोई न कोई साहित्यिक गतिविधि होती थी, लेकिन कोरोना ने सब कुछ रोक दिया।
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लोहिया ने की थी तारीफ
हिंदी भवन के अध्यक्ष अजय कुमार बताते हैं कि हिंदी भवन के विजिटर रजिस्टर में डॉ रामनोहर लोहिया ने लिखा है कि इस भवन के निर्माण में दो बातें खास हैं। एक यह कि सिर्फ एक आदमी के प्रयास से इसका निर्माण हुआ है दूसरा यह कि इसकी लागत महज एक लाख रुपये है जो इस इमारत के निर्माण में बरती गई ईमानदारी का हस्ताक्षर है।

हिन्दी भवन की फोटो। संवाद- फोटो : JAUNPUR

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