साहित्य अकादमी व संगीत नाट्य पुरस्कारों को लौटाना पूर्ण रूप से राजनीति से प्रेरित है। जो लोग ऐसा कर रहे हैं उन्हें उत्तर प्रदेश और कर्नाटक की स्थितियों की ओर भी गौर करना चाहिए, जहां कानून व्यवस्था की स्थिति बद से बदतर है और जहां आए दिन दंगे हो रहे हैं।
ये साहित्यकार इन्हीं सरकारों से पुरस्कार ले रहे हैं और दूसरी ओर केंद्र सरकार के खिलाफ एक सुनियोजित राजनीतिक आंदोलन छेड़े हैं, जिसमें पुरस्कारों को वापस करना एक हथियार के रूप मेें इस्तेमाल किया जा रहा है। लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने यह बात उरई जालौन में संस्कार भारती द्वारा आयोजित राष्ट्रीय लोककला महोत्सव के दौरान कही।
उन्होंने कहा कि जिन साहित्यकारों ने केंद्र सरकार पर देश में सांप्रदायिक माहौल खराब करने का आरोप लगाया है, वहीं उत्तर प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों जहां दंगे हो रहे हैं, की सरकारों से पुरस्कार ले रहे हैं। इनमें एक ऐसे भी हैं जिन्होंने साहित्य अकादमी के मंत्री पद पर रहते हुए स्वयं को ही पुरस्कार दिला दिया।
आज ये साहित्यकार टीवी पर डीबेट कर अपने पुरस्कार वापस कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि कला और साहित्य भाव अभिव्यक्ति का सशक्त साधन हैं। यदि कोई विरोध है तो उसे अपने साहित्य और कला के माध्यम से आगे लाए। पुरस्कार वापस करने का क्या औचित्य है।
वहीं, नेशनल बुक ट्रस्ट भारत सरकार के अध्यक्ष बलदेव भाईजी शर्मा ने कहा कि पुरस्कार वे ही लोग लौटा रहे हैं जिन्हें वर्तमान केंद्र सरकार के संस्कृति संरक्षक होने से आपत्ति है। भारतीय संस्कृति का संरक्षक होना कोई अपराध नहीं है, भारतीयता की बात करना कोई अपराध नहीं है।
फिर कहां देश में असहिष्णु और सांप्रदायिक माहौल खराब होने जैसा माहौल है। गैर बीजेपी सरकार वाले राज्यों में दंगे हो रहे हैं। देश में इस वक्त साहित्यकारों की खेमेबंदी शुरू हो गई है। साहित्यकारों का एक विशेष दल किसी विशेष राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित होकर यह सब कर रहा है।
लोक कला के क्षेत्र में अब तक 34 किताबें लिख चुके व साहित्य अकादमी पुरस्कार से 2014 में पुरस्कृत भोपाल के वसंत निर्गुणे ने कहा कि सम्मान और पुरस्कार रचनाकार की उपलब्धि होती है। रचनाकार को उसके साहित्य के लिए पुरस्कृत किया जाता है।
पुरस्कार लौटाना साहित्य का अपमान है। जो किसी भी साहित्यकार को नहीं करना चाहिए। विरोध के और भी तरीके हैं, पर विरोध भी तर्क संगत और न्याय संगत होना चाहिए। वर्तमान में साहित्यिक पुरस्कारों को लौटाना पूर्ण रूप से राजनीति से प्रेरित लगता है।
विजय दत्त त्रिपाठी श्रीधर, माधव राव सप्रे संग्रहालय भोपाल के संस्थापक ने कहा कि विरोध के और भी माध्यम हो सकते हैं। फिर विरोध भी तर्क संगत हो। पुरस्कारों को लौटा देना साहित्य और कला प्रेमियों का भी अपमान है।