फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

नई पीढ़ी के लिए कला व संस्कृति का दस्तावेजीकरण जरूरी

Mon, 26 Oct 2015 11:45 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, जालौन
विज्ञापन
विज्ञापन
भारतीय लोक संस्कृति हमारी जीवन शक्ति है, इसे पूरे विश्व ने माना हैै। कलाओं से आत्मा का परमात्मा से मिलन होता है, ऐसी कलाओं का संरक्षण जरूरी है। जीवन की लय टूट रही है इसे बचाने के लिए मनीषियों को समाज के बीच जाना होगा और नई पीढ़ी के लिए लोक कलाओं और संस्कृति का दस्तावेजीकरण करना होगा।
विज्ञापन


आने वाली पीढ़ी जब लोककला संस्कृति को जानेगी समझेगी तभी उसको अपने जीवन में उतारेगी। यह बात राष्ट्रीय लोक कला महोत्सव में दूसरे दिन आयोजित हुई राष्ट्रीय स्तर पर संगोष्ठी में लोककला एवं भारतीय संस्कृति के संरक्षण पर काम कर रहे मनीषियों ने कही।

सभी का मत था कि परिवार के टूटने से भी संस्कृति पर चोट पहुंची है। हर ओर से एक ही आवाज आई कि लोक कलाओं व संस्कृति के संरक्षण को लेकर जो कवायद शुरू हुई इस पर निरंतर काम होना चाहिए। महोत्सव के दूसरे दिन लोककलाओं के संरक्षण विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी मां सरस्वती व गजानन की प्रतिमा के सामने दीप प्रज्ज्वलन के साथ शुरू हुई।
विज्ञापन


संगोष्ठी में नेशनल बुक ट्रस्ट नई दिल्ली के अध्यक्ष बल्देव भाईजी शर्मा ने लोककला व संस्कृति के साथ मातृभाषा के संरक्षण की जरूरत बताई। कहा कि लोक का अर्थ गांव नहीं है बल्कि पूरा देश है। लोक कला की परिभाषा को बदलना होगा।

क्षेत्र व समाज का विभाजीकरण अंग्रेजों की देन है। इससे बाहर निकलकर विविधता में एकता लाने के लिए प्रयास किए जाए। कंप्यूटर के युग में लोग स्मृति भी खो रहे है। जीवन की लय टूट रही है। इसके लिए संवाद जरूरी है। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी के लिए दस्तावेज तैयार हो और लोककलाओं का व्यापक स्तर पर प्रदर्शन हो।

लोकगीत गायिका मालिनी अवस्थी ने कहा कि आज के इस दौर में संयुक्त परिवार विलुप्त हो रहे है इसका असर लोककलाओं व हमारी संस्कृति पर पड़ा है। रिश्तों की परिभाषा नई पीढ़ी भूल रही है। आज की पीढ़ी लोक कलाकारों की दशा देखकर सीखने को तैयार नहीं है।

इसके लिए शासन व प्रशासन भी कम दोषी नहीं है। लोक गीतों को जाति धर्म से न जोड़ें, यह तो कला का मंच है। उन्होंने अपने अंदाज में रचनाएं सुनाई तो सभागार तालियों से गूंज उठा। इसी के साथ उन्होंने अपने जीवन और परिवार से जुड़ी यादों को सांझा किया और कहा कि इस क्षेत्र में कड़ी तपस्या से मुकाम हासिल होता है।

लोककला लेखक बंसत निर्गुणे ने कहा कि लोक नृत्य किसी भी देश संस्कृति की महानतम कला के जीवंत दस्तावेज होते है। इनमें राष्ट्र की आत्मा का निवास होता है। लोकलाओं का संरक्षण जरूरी है लेकिन यह तब संभव है जब इसका प्रदर्शन हो। निरक्षरता और अज्ञानता में फर्क है।

पद्मश्री विजय दत्त त्रिपाठी ने कहा कि लोककलाओं को नई पीढ़ी के बीच पहुंचाने की जरूरत है। इस समय संस्कृति विपदा से जूझ रही है इसका हल शासन व प्रशासन के पास नहीं है इसका हल हम सभी हैं। उन्होंने कहा कि अहिंसा वाले गांधी जी के देश में ऐसी हिंसा हो रही है इसमें सब नष्ट हो जाएगा।

अब जागने का समय आ गया है। महाराष्ट्र से आए गणेश दत्त रोड़े ने कहा कि लोक कलाएं विलुप्त हो रही हैं। इनके संरक्षण की जरूरत है क्योंकि यहीं वह साधन है जो आत्मा को परमात्मा से मिलाने का काम करती है।

संगोष्ठी में संस्कार भारती के संयोजक गिरीश चंद्र मिश्रा, गोरखपुर से आए हरि प्रसाद, जिले के इतिहास व साहित्यकार डॉ. हरीमोहन पुरवार, डॉ. कुमारेंद्र सिंह सेंगर, डॉ. राकेश नारायण द्विवेदी, डॉ. रेनू चंद्रा के अलावा लोकमंगल के निदेशक अयोध्या प्रसाद गुप्त कुमुद ने भी अपने विचारों को व्यक्त किया।

कार्यक्रम का संचालन दीप्ती कुशवाहा ने किया। इस दौरान वक्ताओं को साल श्रीफल एवं स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया। इस दौरान योगेंद्र जी, इतिहासकार डीके सिंह, गोपाल कृष्ण अवस्थी, राजेंद्र पाठक, डा. एसपी बुधौलिया आदि मौजूद रहे।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें