एट (जालौन)। ग्राम पंचायत सैदनगर से निकली बेतवा नदी किनारे पहाड़ों पर बसे रक्तदंतिका शक्तिपीठ का वर्णन दुर्गा सप्तशती में भी मिलता है। कहते हैं कि यह मंदिर सदियों पुराना है। भक्तों का कहना है कि इस सिद्धपीठ पर पूजा करने से सबकी मुरादें पूरी होती हैं। इसी प्रकार दूसरी शक्ति पीठ मां अक्षरा देवी का मंदिर भी श्रद्धा का केंद्र है।
जिले में प्राचीन शक्तिपीठों पर भक्तों में अपार श्रद्धा है। लोगों में मान्यता है कि जिले की दोनों शक्तिपीठों पर पूजा करने से व मन्नत मांगने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। नवरात्र में बुंदेलखंड के विभिन्न जिलों से भक्त इन शक्तिपीठों पर आकर पूजा-अर्चना करते हैं। कोटरा थाना क्षेत्र के सैदनगर स्थित बेतवा नदी के किनारे अलग-अलग पहाड़ों पर बने ऐतिहासिक एवं प्राचीन शक्तिपीठ मंदिरों की अलग पहचान व मान्यताएं हैं। चैत एवं शारदीय नवरात्र के अलावा मकर संक्रांति पर भव्य मेले का आयोजन होता है। बुंदेलखंड के कोने-कोने से श्रद्धालु मंदिरों पर मत्था टेकने के साथ मन्नतें भी मांगते हैं और उनकी मनोकामना भी पूरी होती है।
ग्राम पंचायत सैदनगर से निकली बेतवा नदी किनारे पहाड़ों पर बसे रक्तदंतिका शक्तिपीठ तंत्र साधना का केंद्र हुआ करता था। यहां पर बलि देने का प्रावधान था। कई वर्षों पहले लंका वाले महाराज यहां पर रुक गए थे, उन्होंने यहां पर साधना शुरू की। वह किसी से बातचीत नहीं करते थे। उनके समय से ही नवरात्र के दिनों में कुछ साधक देवी भक्त मंदिर में रुकने लगे थे। मंदिर के साथ ही दूसरी तरफ हनुमान जी का मंदिर भी बना हुआ है। मंदिर की विशेषता यह है कि देवी मंदिर में दो शिलाएं रखी हुई हैं, यह शिलाएं रक्तिम हैं।
मान्यता है कि सती के दांत यहां पर गिरे थे, अगर शिलाओं को पानी से धो दिया जाए तो कुछ ही देर में यह शिलाएं फिर से रक्तिम हो जाती हैं। अब इस मंदिर में एक देवी प्रतिमा की स्थापना कर दी गई है। वास्तविक पूजा दंत शिलाओं की ही होती है। मंदिर के पुजारी भगवानदास फलाहारी ने बताया की गर्भ गृह में किसी को जाने की अनुमति नहीं है।
साढ़े तीन मात्राओं के एक पिंड की होती है पूजा
सैदनगर में बेतवा नदी के किनारे दूसरी ओर पहाड़ी पर स्थित मां अक्षरा देवी शक्ति पीठ का मंदिर है। जानकारों के अनुसार, अध्यात्मिक पौराणिक धरोहरों में अक्षरा देवी धाम एक है। बताते हैं कि ईसा पूर्व यहां पर चेदिवंश का शासन हुआ करता था। दक्षिण भारत से आए संन्यासी ब्रह्म कृष्ण स्वामी ने यहां पर प्रवास किया। मंदिर का रखरखाव व विशाल सरोवर का सुंदरीकरण उन्हीं की प्रेरणा से हो सका। यहां पर बौद्धिक साधना ही मान्य है। बलि पूजा का अंग होने की वजह से नारियल तक चढ़ाने की परंपरा नहीं है।
यह मंदिर जनपद के दूरदराज तक विख्यात सिद्ध शक्ति पीठों में से एक है। यहां प्रतिदिन सैकड़ों व नवरात्र में अपार श्रद्धालु दर्शन करने को आते हैं। नवरात्र के बाद पड़ने वाली एकादशी को यहां मेला भी लगता है। मंदिर में कोई प्रतिमा नहीं है, बल्कि अक्षरों पर लगने वाले साढ़े तीन मात्राओं के एक पिंड की पूजा होती है। यह मंदिर भक्तों की आस्था का केंद्र आज भी बना हुआ है।
कभी नहीं सूखता है कुंड
मां अक्षरा देवी शक्ति पीठ के पुजारी राजेंद्र बुधौलिया ने बताया कि पहाड़ पर बने कुंड की कई विशेषताएं हैं कई सालों पहले तीन साल के लिए गांव में सूखा पड़ा हुआ था लेकिन कुंड का पानी कभी नहीं सूखा था वह बराबर भरा हुआ था और आज भी वह भरा रहता है कुंड का पानी सुबह के समय मां अक्षरा देवी के स्नान के लिए इस्तेमाल किया जाता है जबकि कुंड की गहराई 15 फीट के लगभग की बताई जा रही है लेकिन कभी भी कुंड का पानी भीषण गर्मी में भी नहीं सूखता है।