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बेबस मजदूरों को सरकार से मदद की दरकार

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गुरूग्राम से रिक्शे से पति पत्नी बच्चे के साथ उरई के कदौरा जाता परिवार। ---- देखो सरकार, मजदूरों को ह - फोटो : ORAI
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उरई। राजनीतिक गलियारों में बसों-ट्रेनों के नाम पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है, लेकिन सड़क पर चलते मजदूरों के हालात पर नजर डालें तो साफ हो जाता कि उन्हें मदद की दरकार है।
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सैकड़ों मजदूर ऐसे हैं, जिनके लिए न तो ट्रेन है न बस, जिंदगी के सफर में उनके हमसफर ही मुसीबत की घड़ी में साथ निभा रहे हैं। अपनी हिम्मत और हौसले से कोई रिक्शा तो कोई साइकिल से घर जा रहा है। पैदल चलने वाले भी तमाम हैं और बाइक से परिवार को लेकर निकले भी कई लोग हैं।
संवाद न्यूज एजेंसी कदौरा के अनुसार, छतरपुर के पन्ना इलाके से परिवार का पेट पालने के लिए गुरुग्राम पहुंचे इंद्रपाल को क्या पता था कि उसकी उम्मीदें और आशाएं सालभर के भीतर ही चकनाचूर हो जाएंगी कि उसे परिवार के साथ सैकड़ों मील की दूरी रिक्शे से तय करनी पड़ेगी। इंद्रपाल ने बताया कि वह गुरुग्राम में बेलदारी का काम करता था।
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लॉकडाउन के दौरान काम भी बंद हो गया तो बच्चों का का पेट पालने को पत्नी संगीता के साथ कबाड़ बीनने का काम करने लगा, फिर भी मुश्किलें कम नहीं हो रही थीं। आसपास के लोग बोले, लौट जाओ लेकिन न बस थी, न ट्रेन। बताया, जिस दुकान में कबाड़ बेचते थे, वहां खटारा रिक्शा खड़ा था। पत्नी ने हिम्मत बढ़ाई तो जुगाड़ कर 1400 में उसे खरीदा और घर को निकला।
बताया कि बेटे राजू (5) और बेटी नेहा (3) के साथ करीब आठ दिन पूर्व गुरुग्राम से निकले थे। रात-दिन चलते हुए बुधवार को कदौरा पहुंचे। यहां से बांदा होते हुए पन्ना जाएंगे। पत्नी ने बताया कि जब पति पैडल मारते-मारत थक जाते हैं तो वह रिक्शे में धक्का लगाने लगती है। रिक्शे में बनाए पालने में बच्चे जिंदगी की किताब पढ़ रहे हैं।
इसी प्रकार जिन मजदूरों को राजस्थान से इलाहाबाद तक स्पेशल ट्रेन से और फिर इलाहाबाद से जालौन तक रोडवेज बस से पहुंचाया गया, उसका चालक मंगलवार की रात कदौरा के 18-19 मजदूरों को गांव जमरेही से 16 किमी दूर हाईवे पर ही छोड़कर चला गया। पूरी रात इन प्रवासी मजदूरों को हाईवे किनारे स्थित गल्ला मंडी में ही बितानी पड़ी। बुधवार की सुबह मजदूर रामसजीवन, रविकरन, राजवर्धन आदि ने बताया कि अब उनके पास अपने गांव घर तक पहुंचने का कोई साधन नहीं है, सो उन्हें पैदल ही चलना पड़ेगा।
संवाद न्यूज एजेंसी आटा के अनुसार, उरई-कानपुर हाईवे पर पैदल और बाइक सवार प्रवासी मजदूरों के निकलने का सिलसिला जारी है। पुणे से गोंडा जाने को निकले रामधीरज ने बताया कि लॉकडाउन के बाद से फैक्टरी में ताला पड़ा है। कुछ दिन बचत से काम चलाया तो कुछ दिन दोस्तों ने मदद की, लेकिन फिर हालात खराब हो गए।
बस फिर क्या था, जिस बाइक से कभी फैक्टरी में जाते थे, उसी पर उन्होंने और उनके साथी धर्मेंद्र ने गृहस्थी का जरूरी सामान बांधा और घरों के लिए निकल पड़े। करीब एक सप्ताह से परिवार को लेकर चल रहे हैं। रास्ते में कहीं बिस्कुट तो कहीं दालमोठ खाने को जरूर मिली, लेकिन किसी ने भी रोककर ट्रेन व बस में बैठाने की बात नहीं की।
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