उरई। सर्दियों का मौसम शुरू हो गया और साथ ही शुरू हो गई गांव कस्बों में रहने वालों की मुसीबतें, क्योंकि यहां न तो स्वास्थ्य सेवाएं ही बेहतर है और न ही साफ सफाई है। ग्रामीणों की मानें तो अस्पताल में सिर्फ नाम लिखकर पर्चा काट दिया जाता है और फायदा न होने पर इलाज के लिए शहर की दौड़ लगानी पड़ती है। खासतौर पर महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को सबसे अधिक परेशानी होती है। गंदगी के चलते मच्छरों की भरमार है, घरों का पानी सड़कों पर बह रहा है और नालियां भी बजबजा रही है। जिससे बीमारियां फैलना तय है, उस पर स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति यह है कि कहीं सीएचसी पीएचसी में डॉक्टरों की कमी है तो कहीं पर दवाओं का टोटा और कही कहीं पर जांच की कोई सुविधा नहीं है। ऐसे में गांव कस्बे के लोगों को या तो प्राइवेट इलाज कराना पड़ता है या फिर शहर के अस्पतालों की ओर दौड़ लगानी पड़ती है।
सिरसाकलार क्षेत्र के करीब आधा दर्जन गांवों की लगभग 15 हजार की आबादी इलाज के लिए न्यू पीएचसी पर ही निर्भर है। अब पीएचसी का हाल यह है कि सिर्फ एक डॉक्टर और एक फार्मासिस्ट के सहारे ही पूरी स्वास्थ्य सेवा टिकी हुई हैं। सर्दी के मौसम में सर्दी, जुकाम और बुखार के मरीजों को ही इलाज मिल जाए तो बहुत है, फिर गंभीर बीमारों के लिए कौन कहे। ग्रामीणों का कहना है कि अस्पताल में किसी भी जांच की कोई सुविधा नहीं है, खून, बलगम की जांच हो या एक्सरे सभी कुछ कराने के लिए करीब 12 किमी. दूर कुठौंद ही जाना पड़ता है। इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है। फिर इलाज भी वहीं या फिर उरई, जालौन जाकर ही कराना ठीक लगता है।
कोंच तहसील स्थित ग्राम पिंडारी स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में सुविधाएं हैं तो यहां पर डॉक्टरों की मनमानी मरीजों की परेशानी का कारण बनी हुई है। अस्पताल के मरीजों का कहना है कि डॉक्टर शायद ही कभी ऐसा होता हो जो समय पर अस्पताल आते हो। लिहाजा उन्हें घंटों इंतजार करना पड़ता है। रात के लिए इमरजेंसी सेवा का बोर्ड तो लगा है लेकिन सारी सेवाएं सिर्फ एक एएनएम के सहारे ही चलती हैं। इतना ही नहीं गर्भवती महिलाओं को मिलने वाली सुविधाओं एवं जच्चा बच्चा को मिलने वाली धनराशि के नाम पर गड़बड़झाला चल रहा है। ग्रामीण महेश, राजेंद्र, वीरेंद्र, कमलेश, हेमंत ने बताया कि जो गर्भवती महिलाएं सुविधा शुल्क नहीं देती हैं उन्हें उरई रेफर कर दिया जाता है।
मौसम चाहे सर्दी का हो या गर्मी का यहां का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खुद ही बीमार बना रहता है। यही कारण है कि कस्बा सरावन की 20 हजार की आबादी पूरी तरह से झोला छाप डॉक्टरों पर ही निर्भर है। नहीं इलाज के लिए उरई व जालौन की ही दौड़ लगानी पड़ती है। इसी तरह प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र गोहन, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मडोरी, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र सिरसा दोगढ़ी में भी कोई सुविधा नहीं है।
यहां के निवासी राजीव सिंह, अमित सिंह, भगवत सिंह, राकेश दुबे, कमलापत कुशवाहा, तिलकसिंह, करनसिंह, राजकुमार सिंह आदि का कहना है कि लाखों रुपये की लागत से बने अस्पताल सफेद हाथी साबित हो रहे हैं जिनमें न दवाएं है न जांच के उपकरण। अस्पताल सिर्फ रेफर सेंटर ही बने हैं। सीएमओ अल्पना बरतरिया का कहना है कि दवाओं की कमी की शिकायत तो कहीं से नहीं आई, जहां पर डॉक्टरों की कमी है, वहां दूसरे अस्पताल की ड्यूटी लगाकर ग्रामीणों को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही है। इसके अलावा अक्सर निरीक्षण कर कमियों को दूर करने का प्रयास भी किया जाता है।
पिंडारी स्थित स्वास्थ्य केंद्र जहां सन्नाटा ही रहता है- फोटो : ORAI