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कोरोना योद्धा: कंधा देना तो दूर जिन शवों को कोई छूता भी नहीं उन्हें मोक्षधाम पहुंचा रहे हैं हरीबाबू

Fri, 14 May 2021 01:22 AM IST
प्रभापुंज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर

सार

जहां स्वाभाविक मृत्यु पर भी लोग अपने संबंधियों के शव के पास जाने से डर रहे हैं। वहीं स्वर्गारोहण वाहन के चालक हरीबाबू मृतक को घर से मोक्षधाम तक पहुंचाने का कार्य कर रहे हैं।
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हरिबाबू - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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उत्तर प्रदेश के जालौन में कोरोना काल में नगर के समाजसेवियों के सहयोग से संचालित निशुल्क स्वर्गारोहण वाहन मानवता की मिसाल है। जहां स्वाभाविक मृत्यु पर भी लोग अपने संबंधियों के शव के पास जाने से डर रहे हैं। वहीं स्वर्गारोहण वाहन के चालक हरीबाबू मृतक को घर से मोक्षधाम तक पहुंचाने का कार्य कर रहे हैं।
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हरीबाबू को इलाके में लोग कोरोना योद्धा के नाम से भी पुकारने लगे हैं। कोरोना संक्रमण के कारण लोगों में इतना डर है कि स्वाभाविक मृत्यु पर भी परिचित लोग अपनी जान पहचान वालों के यहां मृतक को कंधा देना तो दूर उनके पास तक नहीं जा रहे हैं। ऐसे में उन्हें नगर में समाजसेवियों द्वारा धर्मार्थ चलाए जा रहे अंतिम यात्रा स्वर्गारोहण वाहन की याद आती है।

 
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स्वर्गारोहण वाहन कोरोना काल में मानवता की मिसाल है। केवल एक फोन काल पर इस स्वर्गारोहण वाहन के चालक सहावनाका निवासी हरीबाबू मृतक के घर पहुंच जाते हैं और उसे मोक्षधाम तक पहुंचाते हैं। बता दें कि मृतक के परिजनों से इस सेवा के बदले कोई शुल्क भी नहीं लिया जाता है। इस वाहन में डीजल भी समाजसेवियों की ओर से ही उपलब्ध कराया जाता है।

इस वाहन के दानपात्र में कोई व्यक्ति यदि कुछ डालना चाहे तो डाल सकता है यह उसकी इच्छा पर है। इस कार्य के लिए वाहन के चालक हरीबाबू गंभीर परिस्थिति में भी वह लोगों की सेवा में लगे हैं। हरीबाबू ने बताया कि सूर्योदय से सूर्यास्त तक किसी भी समय फोन आने पर वह तुरंत वाहन लेकर गंतव्य तक पहुंच जाते हैं। इस कठिन परिस्थिति में वह किसी के काम आ रहे हैं यह सोचकर मन को आत्मिक शांति मिलती है।

प्रतिदिन कम से कम दो से तीन फोन तो आ ही जाते है। कभी इससे ज्यादा भी होते हैं। हालांकि परिजन कोरोना काल में उन्हें इस कार्य के लिए मना करते हैं। कहते हैं कि रोजी रोटी का कोई दूसरा साधन देखें। पर यह मात्र पेट पालने का काम नहीं है बल्कि इस कठिन दौर में जब अपने ही अपनों के शवों उठाने से दूर भाग रहे हैं तो किसी न किसी को तो आगे आना ही होगा। यही सोचकर वे शवों को ढोने में जुटे हैं।
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