माधौगढ़। तहसील क्षेत्र में बेहतर गन्ना उत्पादन के बाद भी किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। सरकारी कांटा व शुगर मिल न होने से किसान क्षेत्र में लगे गुड़ बनाने वाले प्राइवेट गन्ना क्रेशरों में औने पौने दामों में बेचने को मजबूर है। यही कारण है कि किसानों को अब गन्ना की फसल उगाने में कोई फायदा नजर नहीं आ रहा।
चार दशक पहले माधौगढ़ क्षेत्र में गन्ना इतनी पैदावार थी कि सन 1974-75 में डिकौली में शासन ने बुदेलखंड मिनी शुगर मिल की स्थापना की थी। किसानों को समय से भुगतान न होने, मशीनों के रखरखाव में कमी के चलते ही पांच वर्ष बाद मिल बंद हो गई। इसके बाद धीरे-धीरे जिन खेतों में गन्ने की फसल दिखाई देती थी, वहां गेहूं और मटर की फसलें दिखने लगी। कुरसेडा़ निवासी किसान आनंद सिंह सेंगर का कहना है कि खेत में एक तिहाई से लेकर दो तिहाई हिस्से में गन्ना बोआई करते थे। कुछ किसान तो पूरे जमीन पर गन्ना बोते थे।
हरौली निवासी किसान अरविंद सिंह राजू का कहना है कि आंधी, तूफान, ओलावृष्टि के दौरान गन्ना की फसल में कोई नुकसान नहीं होता है। यहां तक कि गन्ने की पकी फसल में आग लग जाने के बाद भी 70 प्रतिशत रिकवरी मिल जाती है। धमना निवासी किसान महेंद्र सिंह का कहना है कि घाटमपुर शुगर मिल का कांटा लग जाता था। मिल के बिक जाने के बाद गन्ना किसानों के सामने समस्या खडी़ हो गई है।
चितौरा निवासी किसान कौशलेंद्र सिंह का कहना है कि क्षेत्र के अटागांव, सुरावली, कुरसेडा़, धमना, चितौरा, हरौली, ऊमरी, गोहन, सुरपतिपुरा सहित आधा सैकडा़ गांवों में गन्ने की फसल अधिक मात्रा में होती थी। कांटा न लगने से किसानों ने गन्ना फसल करना कम कर दिया है। क्षेत्र में लगे गुड़ गन्ना क्रेशर के मालिक 150-200 रुपये क्विंटल खरीद रहे है। वही घटतौली, समय पर पैसा न मिलने से किसानों के सामने समस्या खड़ी हो जाती है।