उरई/मुहम्मदाबाद। उरई-राठ मार्ग को हादसों का सफर यूं नहीं कहा जाता है। करीब 25 किमी के इस आधे अधूरे हाईवे पर अब तक न जाने कितनी मांगों का सिंदूर मिट गया और न जाने कितनी माताओं की कोख सूनी हो गई। कई लोग तो इन ओवरलोड मौरंग के ट्रकों की चपेट में आकर अपने हाथ पैर तक गंवा चुके हैं और आज विकलांगता का जीवन गुजार रहे हैं। शुक्रवार को जब एक नई नवेली दुल्हन की मांग का सिंदूर मिटा तो फिर गांव वालों की पुरानी यादें ताजा हो गई। ग्रामीणों का कहना है कि जब तक हाईवे का निर्माण पूरा नहीं हो जाता, तब तक उरई राठ मार्ग इसी तरह खून का प्यासा बना रहेगा।
उरई-राठ मार्ग के इस अधूरे हाईवे पर कहीं कोई डिवाइडर व स्पीड ब्रेकर नहीं है। खतरनाक पुलिया अक्सर हादसों का कारण साबित होती है। उस पर खदानों से निकलकर तेज रफ्तार दौड़ते ट्रकों के पहिए न जाने कब किसके लिए काल बन जाए कोई नहीं जानता है। रोड पर मुहम्मदाबाद, कुसमिलिया, डकोर, मुहाना, खरका आदि आधा दर्जन से अधिक गांव आते हैं और यहां के ग्रामीण जान हथेली पर लेकर ट्रकों के बीच से गुजरते हैं। किसी को भी रात के वक्त घर पहुंचने में थोड़ी भी देर हो जाती है तो घरवालों का कलेजा हादसों के डर से कांपने लगता है। पीडब्ल्यूडी के अधिकारियों का कहना है कि तीन चार साल से अधूरे हाईवे पर काम बंद पड़ा था, जैसे-जैसे बजट आ रहा है, उसका निर्माण किया जा रहा लेकिन मार्ग पर चलने वालों की जिंदगी की गारंटी लेने वाला कोई नहीं है।
बूढ़े पिता ने उठाया था जवान बेटे का जनाजा
मुहम्मदाबाद निवासी अहमद हुसैन बताते हैं कि इसी उरई-राठ मार्ग ने 1 अप्रैल 2009 में उनके जवान बेटे साजिद (25) को उनसे हमेशा के लिए छीन लिया था। बेटा साजिद अपने दोस्त प्रेमनारायण के साथ बाइक से जा रहा था, ट्रक ने ऐसी टक्कर मारी कि बेटा एक बार जमीन पर गिरकर लहूलुहान हुआ तो दोबारा उसकी जुबांन से अब्बू सुनने को नहीं मिला। बूढ़े पिता के कंधों पर जवान बेटे का जनाजा उठाने वाला दिन जो उन्होंने देखा है, अल्लाह वो किसी को न दिखाए। बस यही दुआ है कि हाईवे बन जाए और ट्रकों की रफ्तार पर काबू हो जाए, ताकि हमारी तरह किसी और के घर का चिराग यूं न बुझे।
ट्रक ने छुड़ा दिया पत्नी से जीवनभर का साथ
ऐरी रामपुरा निवासी प्रदीप बताते हैं कि पति-पत्नी का साथ सात जन्मों का होता है लेकिन शुक्रवार को हुई घटना की तरह ही राठ मार्ग पर हुए हादसे ने उनकी पत्नी शांति का साथ उनसे छुड़ा दिया। दिसंबर 2014 की रात जब वह शांति के साथ अपनी ससुराल कुसमिलिया से लौट रहे थे, तभी उरई-राठ मार्ग पर पीछे से आ रहे ट्रक की एक टक्कर से बाइक पर बैठी पत्नी सड़क पर ऐसे गिरी कि फिर कभी नहीं उठ सकी। गुस्साए लोगों ने दो तीन ट्रकों में आगजनी भी की लेकिन इससे शांति तो लौटकर आने वाली नहीं थी। फिर शुक्रवार को एक जोड़ा बिछड़ गया, न जाने कब तक उरई राठ मार्ग पर यूं ही मौत नाचती रहेगी।
डोली उठने से पहले ही उठी बेटी की अर्थी
मुहम्मदाबाद निवासी संगीता का कहना है कि हर माता पिता के बेटी की शादी को लेकर बड़े अरमान होते हैं, लेकिन हमारे सारे अरमान ट्रकों के पहियों ने हमेशा के लिए दफन कर दिए। 4 सितंबर 2015 का वह दिन आज भी आंखों के सामने घूमता है, जब इसी उरई-राठ मार्ग पर ट्रक के पहियों ने स्कूटी सवार उनकी शिक्षिका बेटी नेहा को रौंद दिया था। हाथों में मेहंदी लगने से पहले ही खून लग गया था और इस मां की आंखों के सामने डोली नहीं बेटी की अर्थी की उठी थी। कितनी अच्छी थी हमारी लाडो लेकिन इन ट्रक वालों को न जाने क्या दुश्मनी थी जो बेटी की जिंदगी का चिराग ही बुझा दिया।
सड़क ने पैर छीने और छिन गईं सारी खुशियां
एक पैर से विकलांग कुसुमिलिया निवासी करन सिंह बताते हैं कि ट्रक के पहिए एक पैर से ऐसे गुजरे कि उसके बाद आज तक नकली पैर का सहारा लेना पड़ रहा है। कानपुर के रीजेंसी अस्पताल में भी काफी दिन इलाज चला, करीब पांच लाख रुपया खर्च हुआ और आखिर में डॉक्टरों को जान बचाने के लिए उनका पैर काटना ही पड़ा। इसके बाद करीब 3 लाख रुपये नकली पैर बनवाने में लगे। राठ मार्ग पर हुए हादसे ने जिंदगी की सारी खुशियों पर पानी फेर दिया। परिवार के लिए न जाने क्या क्या सोच रखा था और अब स्वयं ही परिवार के सहारे हूं। ईश्वर ऐसी तकलीफ किसी और को न दे।