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मारो मोहर तान के, झंडे को पहचान के...लगते थे नारे

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उरई। लोकसभा चुनाव का बिगुल बज गया है, नेताओं की आंखों के सामने सत्ता की कुर्सी भी नाचने लगी है। वहीं मतदाता भी सोच रहा है कि वोट की ताकत से इस बार किसे चोट करनी है। इनके बीच कुछ ऐेसे लोग भी हैं, जिन्होंने जिंदगी के न जाने कितने बसंत की तरह कितने लोकसभा चुनाव देखे हैं।
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चुनाव में आए अंतर की कहानी बताते हुए बुजुर्ग कहते हैं कि पुराने जमाने के और आज के चुनाव में काफी फर्क आ गया है। प्रचार बैलगाड़ी से शुरू होकर हेलीकाप्टर तक और मतदान एक पर्चे से लेकर वीवीपैट तक पहुंच गया है। पहले की अपेक्षा आज चुनाव में सुविधा अधिक हो गई है। वोट डालने में ज्यादा परेशानी नहीं होती है।

लेकिन बुजुर्ग कहने से गुरेज नहीं करते हैं कि अबकी राजनीति में गिरावट आई है, अब विकास की लड़ाई नेताओं की व्यक्तिगत लड़ाई के रुप में दिखने लगी है। इन मतदाताओं का कहना है कि उनके समय में कोई दल नहीं बल्कि जनता ही अपने बीच के किसी व्यक्ति को राजनीति में प्रवेश कराती थी और यही वजह थी कि तबके चुनाव में वादे नहीं प्रत्याशी के नेक इरादों पर वोट दिया जाता था। सिर्फ झंडों के रंगों को देखकर बैलेट पेपर पर मोहर लगाई जाती थी।
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लकड़ी की मोहरें, अब वीवीपैट का जमाना
सिरसाकलार। दौनापुर गांव के 90 वर्षीय सोबरन सिंह बताते हैं कि वे अभी तक बारह लोकसभा चुनाव में वोट डाल चुके हैं। एक समय था जब सादे पेपर पर लकड़ी की मोहर से वोट डाला करते थे, आज तो जमाना ईवीएम और वीवीपैट तक पहुंच गया है, वोट डालने के लिए भी सहारे की जरूरत पड़ती है।

12 किमी. दूर जाते थे वोट डालने
सिरसाकलार। गोंगूरा गांव निवासी छिद्दू प्रसाद ने बताया कि 95 साल की उम्र हो गई है, ज्यादा चला नहीं जाता है। पहले के जमाने में हदरुख से 12 किमी. दूर चलकर वोट डालने जाना पड़ता था, लेकिन तब जोश था, अब तो ताकत भी नहीं बची है। अच्छा है घर के पास ही पोलिंग बूथ बना है, किसी न किसी के साथ जाकर वोट डाल देंगे।

हाथ उठाने से ही पड़ जाता था वोट
रामपुरा। रामपुरा के 88 वर्षीय नत्थू सिंह ने कहा कि उन्होंने सबसे पहली लोकसभा 1952 में भी वोटिंग की थी। तबके समय में छोटे-छोटे चुनाव तो सिर्फ हाथ उठाने से ही पूरे हो जाते थे, वोटिंग की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। न प्रचार का कोई शोरशराबा था और न ही जातिवाद की राजनीति थी। जिसका चाल-चलन नेक हुआ, वही नेता हुआ करता था।

पर्ची का काम नहीं, तख्त पर खड़े होते थे नेता
रामपुरा। क्षेत्र के ही जगदीश शरण द्विवेदी का कहना है कि बहुत चुनाव देखे हैं बाबू, तब आज की तरह पोलिंग बूथ पर सेना और पुलिस नहीं बल्कि एक डंडे वाला सिपाही भर ही खड़ा रहता था। बिना पर्ची के सिर्फ नाम व पता बताकर वोट डाल आते थे, सभी नेता एक तख्त पर खड़े होकर बारी-बारी से अपना प्रचार भी कर लिया करते थे।

अनपढ़ होकर भी समझा वोट का महत्व
सरावन। सन् 1929 में जन्मी अन्नपूर्णा देवी बताती है कि वो अब तक 15 बार वोट डाल चुकी हैं, वह भी तब जब वे अशिक्षित हैं, लेकिन वोट का महत्व हमेशा समझा क्योंकि यहीं वह ताकत है जो हमें और हमारी आने वाली पीढ़ी को विकास के दरवाजे तक ले जाती है। वे आज भी घर आने वाले लोगों को वोट डालने के लिए जरूर बोलती हैं।

राजनीति में अब सेवा भाव नहीं दिखता है
सरावन। करीब 89 वर्षीय कस्बा कुठौंद निवासी पूर्व प्रधान रामबाबू शुक्ला बताते हैं कि अब तक वे सभी 16 लोकसभा चुनाव में वोट कर चुके हैं और राजनीति में काफी परिवर्तन महसूस किया है। पहले नेता घरों की चारपाई तक में बैठ जाया करते थे, अब तो हेलीकाप्टर से हाथ हिलाकर चले जाते हैं। सेवा भाव की तो राजनीति में कोई जगह ही नहीं बची है।

निमंत्रण की तरह बुलावा देते थे नेता
कदौरा। ग्राम बागी निवासी राजेंद्र बाबू तिवारी के मुताबिक अब तक वे 10 मर्तबा लोकसभा चुनाव में वोट कर चुके हैं, कहना है कि पहले के चुनाव में दावेदार मतदान तक घरों के न जाने कितने चक्कर लगा लेते थे और वोट के लिए तो ऐसे बुलाते थे जैसे कि अपने घर के किसी समारोह का आमंत्रण दे रहे हो, लौटत-लौटते कह जाते थे भइया आना जरूर वोट डालने।

आज नेता कम, मतदाता अधिक जागरूक
माधौगढ़। कैलोर निवासी 71 वर्षीय शिवशंकर सिंह का कहना है कि आज नेता चुनाव के प्रति कम गंभीर है, सिर्फ धनबल को महत्व देते हैं लेकिन आज का मतदाता सबसे अधिक जागरूक है, वह अपने वोट का महत्व जानता है और सोच समझ कर ही वोट करता है। हमारे वक्त में जागरुकता का कोई अभियान भी नहीं चलता था।
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