मलिन बस्तियों में रहने वाली महिलाओं को समाज की मुख्य धारा में जोड़ने के लिए अनु विमल के प्रयास सराहनीय हैं। वह अपनी संस्था जन कल्याण समिति की मदद से महिलाओं की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहती हैं। वह महिला सशक्तीकरण, प्रौढ़ व बाल संस्कार केंद्र चलाती हैं। मलिन बस्तियों की महिलाओं को शिक्षा व रोजगार के लिए प्रेरित करती हैं। सेवा भारती के जुड़े संगठन मातृ मंडल के माध्यम से महिलाओं को शिक्षा के प्रति जागरूक करना उनकी प्राथमिकता में शामिल है। वह अब तक दर्जनों महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाकर समाज में समान अधिकार दिला चुकी है। अनु विमल का कहना है कि इस काम में मुझे मेरे परिवार का भी पूरा सहयोग मिला है। पिता व ससुर के बाद पति ने उन्हें आगे बढ़ाया।
वैज्ञानिक अंजलि गंगवार बन गईं महिलाओं की आवाज
सासनी में तैनात एसडीएम अंजलि गंगवार बेसहारा महिलाओं की मदद को हमेशा तत्पर रहती हैं। बरेली की निवासी अंजलि वर्ष 2019 बैच की पीसीएस अधिकारी हैं। इससे पहले वह वरिष्ठ वैज्ञानिक थीं। महिलाओं की आवाज बनने के लिए उन्होंने प्रथम प्रयास में ही पीसीएस परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। अंजलि एक बेटी की मां भी है। वह एक प्रशासनिक अधिकारी और मां दोनो का दायित्व बखूबी निभा रही हैं। कोई पीड़ित महिला अपनी कोई समस्या लेकर जब आती है तो वह उसकी समस्या का निराकरण करती हैं। उनका कहना है कि महिलाओं को आत्मनिर्भर बनना चाहिए, जिससे कि वह अपने निर्णय खुद ले पाएं। उनका यह भी कहना है कि महिलाएं शिक्षित बनें।
200 परिवारों को टूटने से बचा चुकी हैं सुनीता मिश्रा
महिला कोतवाली की प्रभारी निरीक्षक सुनीता मिश्रा का प्रयास रहता है कि परिवार में विघटन न हो और दाम्पत्य विवाद सुलह समझौते के आधार पर ही निपट जाए। वह पिछले 9 माह से कोतवाली में प्रभारी निरीक्षक हैं। इस दौरान वह 200 दांपत्य विवादों में समझौता करा चुकी है। मूल रूप से मुरादाबाद निवासी सुनीता मिश्रा वर्ष 2009 में वह एसआई के रूप में पुलिस में भर्ती हुई और वर्ष 2015 में निरीक्षक बनीं। उनका कहना है कि उनकी कोशिश रहती है कि कोई भी परिवार टूटने से बचे और विवाद आपस में ही निपट जाए। जो भी पीड़ित महिला अपने दांपत्य विवाद की शिकायत लेकर आती है वह उसे यही समझाती हैं कि परिवार के टूटने से काफी दुष्परिणाम सामने आते हैं।
शहर की महिला पत्रकार मनीषा उपाध्याय को पोषण और महिला सशक्तीकरण जुड़ी बेहतरीन खबरों के लिए यूनिसेफ द्वारा पुरस्कृत किया जा चुका है। कई मीडिया संस्थानों में वह कार्य कर चुकी हैं। शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए भी वह सम्मानित हो चुकी हैं। विभिन्न माध्यमों से नारी सशक्तीकरण की योजनाओं को महिलाओं तक पहुंचाया है। वह सामूहिक विवाह, रक्तदान, महिला व बच्चों के कल्याण के लिए महिलाओं की मदद करती हैं और उन्हें जागरूक करती हैं। उनका कहना है कि महिलाओं आज हर क्षेत्र में अपना परचम लहरा रही हैं। उनका यह भी कहना है कि काफी महिलाएं अभी शिक्षित नहीं है। इसलिए उन्हें अपने अधिकारों की जानकारी नहीं है।
महिलाओं का निशुल्क उपचार कर रही डॉ. रेनू जैन
असहाय रोगियों को निशुल्क एक्युप्रेशर चिकित्सा पद्धति से उपचार करने का काम शहर की पुराना मिल परिसर निवासी डॉ. रेनू जैन कर रही हैं। डॉ. रेनू का कहना है कि उन्होंने शुरू में जब उन्होंने जब इस चिकित्सा पद्धति शुरू किया तो लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते थे। एक तो महिला हूं औ ऊपर से इस तरह का काम। शुरू में लोग इसे लेकर ज्यादा जागरूक नहीं थे। आज डॉ. रेनू जैन असहाय महिलाओं का नि:शुल्क उपचार करती हैं। समाजसेवा के काम में भी काफी काफी रुचि दिखा रही हैं। उनका कहना है कि महिलाएं आत्मनिर्भर बनें और शिक्षित बनें, केवल रसोई तक सीमित न रहें। रोजगारपरक शिक्षा महिलाओं के लिए बेहद जरूरी है।
महिला सशक्तीकरण की मिसाल हैं अधिवक्ता प्रिया गुप्ता
स्थानीय नवल नगर निवासी अधिवक्ता प्रिया गुप्ता पीड़ित महिलाओं की मदद के लिए तत्पर रहती हैं। मूल रूप से कस्बा मेंडू निवासी प्रिया गुप्ता के पिता रमनबाबू गुप्ता की वर्ष 2011 में हत्या कर दी गई। इस घटना ने उनकी जिंदगी में बेहद बदलाव ला दिया। प्रिया गुप्ता के सिर से पिता का साया उठ चुका था, लेकिन उसके बाद उन्होंने अपने पिता के हत्यारे को सजा दिलाने की ठान ली। इसके बाद प्रिया ने कानून की पढ़ाई पढ़ी। वह अधिवक्ता बनी और कोर्ट में अपने पिता के हत्यारे को आजीवन कारावास की सजा दिलाई। प्रिया गुप्ता महिलाओं के लिए एक नजीर हैं। उनका कहना है कि महिलाओं को कभी कमजोर नहीं समझना चाहिए। महिलाएं हर क्षेत्र में नए मुकाम हासिल कर रही हैं।