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Hathras News: शेर-हाथी के साथ गया सर्कस का दौर.. तालियों के लिए तरसे कलाकार

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सर्कस में करतब दिखाते कलाकार। संवाद - फोटो : Samvad
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राघवेंद्र प्रताप सिंह
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हाथरस। कभी सर्कस का तंबू लगते ही भीड़ उमड़ पड़ती थी। शेर की दहाड़ और हाथी के करतब पर तालियां गूंजती थीं। बच्चों की आंखों में रोमांच और कलाकारों की जिंदगी में रौनक होती थी। अब वही सर्कस अपने पुराने वैभव की आखिरी सांसें गिन रहा है।
वन्यजीव संरक्षण कानूनों की सख्ती ने शेर-हाथी जैसे बड़े आकर्षण छीन लिए और मोबाइल-टीवी के डिजिटल मनोरंजन ने दर्शकों का मन। नतीजा यह कि कभी सैकड़ों परिवारों का पेट पालने वाला सर्कस आज चंद कलाकारों, पालतू जानवरों और घटती भीड़ के सहारे अपना अस्तित्व बचाने की जद्दोजहद कर रहा है।
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हाथरस के मेला श्री दाऊजी महाराज में जिम्मी सर्कस लेकर पहुंचे काशीपुर (उत्तराखंड) निवासी रहीस (50 वर्ष) बताते हैं कि 1990 के दशक तक सर्कस का मुख्य आकर्षण जंगली जानवर और झूले पर हैरतअंगेज करतब दिखाती लड़कियां हुआ करती थीं। वर्ष 2000 आते-आते शेर, चीता, हाथी, बंदर और तोते जैसे जानवरों के प्रदर्शन पर पूरी तरह पाबंदी लग गई।अब केवल कुत्ता, बकरा, घोड़ा और ऊंट जैसे पालतू जानवरों से काम चलाया जाता है, लेकिन इनमें वह पुराना रोमांच नहीं रहा जो दर्शकों को अपनी ओर खींचे। संवाद
कलाकारों का खर्च बढ़ा, स्टाफ में कटौती
1990 के दशक में नेपाल, महाराष्ट्र और केरल से लड़कियां करीब 300 रुपये प्रतिदिन पर झूला-करतब (ट्रैपेज) दिखाने आती थीं। आज उनका मेहनताना बढ़कर 3,000 रुपये प्रतिदिन तक पहुंच चुका है। इन खर्चों को उठा पाना छोटे सर्कस संचालकों के बस में नहीं है। पहले एक बड़े सर्कस के तंबू को संभालने और कला दिखाने के लिए 100 से 150 लोगों का अमला होता था। अब मात्र 15-20 कर्मचारियों तक रह गया है।

मोबाइल की क्रांति और अनिश्चित भविष्य

सर्कस के पतन का एक बड़ा कारण हर हाथ में मौजूद स्मार्टफोन और इंटरनेट है। रहीस का कहना है कि आज की तेज रफ्तार जिंदगी में लोगों के पास दो-तीन घंटे का वक्त निकालकर सर्कस देखने का सब्र नहीं बचा है। रहीस के दो बेटे तो उनके साथ सर्कस संभाल रहे हैं, लेकिन नई पीढ़ी अब इस ढलते रोजगार से जुड़ना नहीं चाहती।
- हमारे बुजुर्ग बताते थे कि किसी जमाने में भारत के बड़े-बड़े सर्कस पानी के जहाजों में भरकर विदेशों के दौरे पर जाते थे। आज हम पंजाब, दिल्ली, राजस्थान, हिमाचल और हरियाणा के मेलों के चक्कर काटने तक सीमित रह गए हैं। - रहीस, संचालक (जिम्मी सर्कस)
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दर्द के मुखौटे के पीछे छिपी हंसी : जोकर विजय
सर्कस की बदलती दुनिया का सबसे मर्मस्पर्शी चेहरा इसके जोकर हैं। काशीपुर निवासी विजय सिंह पिछले 14 वर्षों से चेहरा रंगकर लोगों को हंसाने का काम कर रहे हैं। तीन भाइयों में अकेले सर्कस से जुड़े विजय को 10,000 रुपये प्रतिमाह वेतन के साथ रहने-खाने की सुविधा मिलती है। अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा वह गांव में मजदूरी करने वाले अपने भाइयों को भेज देते हैं। विजय कहते हैं मैं कोई दूसरा काम नहीं जानता, इसलिए मजबूरी में जोकर की पोशाक पहनकर लोगों की उदासी दूर करता हूं। कभी हमारे शो हाउसफुल हुआ करते थे, लोग जोकर की एक झलक के लिए तरसते थे, अब खाली पड़ी कुर्सियों को देखकर दिल रोता है। संवाद
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