नवजात शिशुओं को जानलेवा बीमारियों से बचाने के लिए जिला महिला अस्पताल में बीते एक दिसंबर को एसएनसीयू (सिक न्यूबोर्न केयर यूनिट) की शुरुआत की गई थी, लेकिन उद्घाटन होने के एक हफ्ते बाद भी यह यूनिट बंद पड़ी है। आनन-फानन स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने वाहवाही बटोरने के लिए इस यूनिट का शुभारंभ तो कर दिया, लेकिन अधिकारी डॉक्टरों का इंतजाम नहीं कर सके।
नियमानुसार इस यूनिट में तीन बाल रोग विशेषज्ञों की तैनाती की जानी चाहिए, लेकिन एक भी डॉक्टर यहां तैनात नहीं है। सरकारी डॉक्टर्स की मनमानी का इससे बेहतर क्या उदाहरण होगा कि सीएमओ ने जिन बाल रोग विशेषज्ञ को सीएचसी से यहां यहां तैनात किया था, उन्होंने ज्वाइन करने से मना कर दिया। अब पीएचसी पर तैनात दो बाल रोग विशेषज्ञों को यूनिट से अटैच कर काम चलाने की कोशिश की गई, लेकिन इन डॉक्टर्स ने भी अधिकारियों के आदेश को ठेंगा दिखाते हुए ज्वाइन नहीं किया है।
डॉक्टर्स के नहीं होने से यूनिट बंद है और लाखों की मशीन मौजूद होने के बावजूद गरीब लोग अपने नौनिहालों का इलाज महंगे निजी अस्पतालों में कराने को मजबूर हो रहे हैं। एसएनसीयू का उद्घाटन एक दिसंबर को डीएम अविनाशकृष्ण सिंह ने किया था। बीते एक हफ्ते में किसी बच्चे का इलाज यूनिट में नहीं हुआ है। उद्घाटन के समय स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने कहा था कि जिला महिला अस्पताल में जन्म लेने वाले बच्चे पीलिया, कुपोषण, डायरिया या किसी अन्य बीमारी से ग्रसित होने पर दम नहीं तोड़ेंगे।
निजी अस्पतालों की तरह ही उन्हें अब महिला अस्पताल में बनी सिक न्यू बोर्न केयर यूनिट में मशीनों के जरिये उपचार मिल सकेगा। तब डीएम ने यूनिट में लगाई गई मशीनों का जायजा भी लिया था। साफ है लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद मशीनों का फायदा बच्चों तक नहीं पहुंच रहा है।
डॉक्टर्स के न होने से एसएनसीयू में इलाज नहीं हो पा रहा है। डॉक्टर्स की तैनाती की कोशिश की जा रही है। इस संबंध में सीएमओ से डॉक्टर्स की तैनाती को कहा गया है।
- डॉ. कंचन अग्रवाल, सीएमएस जिला महिला अस्पताल
वहीं दिल्ली, केरल व अन्य स्थानों पर बर्ड फ्लू के मामले सामने आने पर शासन ने गंभीरता दिखाई है। शासन स्तर से जिले के डीएम, सीएमओ व मुख्य पशु चिकित्साधिकारी को पत्र जारी कर विशेष सतर्कता बरतने और तत्परता से कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं। शासन ने दिए निर्देशों में कहा है कि दिल्ली के चिड़ियाघर में कुछ जलीय पक्षियों की मृत्यु में बर्ड फ्लू वायरस ए होने की पुष्टि हुई है। इसके अलावा ग्वालियर मध्य प्रदेश तथा केरल में भी बर्ड फ्लू के वायरस से पक्षियों की मौत के मामले सामने आए हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक बर्ड फ्लू वायरस इंसानों के लिए अधिक खतरनाक नहीं है। लेकिन फिर भी सरकार कोई रिस्क उठाना नहीं चाहती। प्रवासी पक्षियों के आगमन के कारण प्रदेश में भी इस रोग के आयात होने का खतरा है। बर्ड फ्लू पक्षियों की बीमारी है और जंगली पक्षियों में इस बीमारी को नियंत्रित किया जाना अत्यंत कठिन है। जंगली पक्षियों से पालतू पक्षी जैसे मुर्गी, बतख और कबूतर में इस बीमारी के संक्रमण को रोकना पशुपालन विभाग की जिम्मेदारी है।
हालांकि अभी भारत में कहीं भी इस वायरस से किसी भी मानव रोगी के ग्रस्त होने की सूचना नहीं है, लेकिन फिर भी सतर्कता बेहद जरूरी है। इसके लिए पूर्व रणनीति बनाना जरूरी है। शासनादेश में निर्देश दिए गए हैं कि जिला स्तरीय टास्क फोर्स का गठन किया जाए। बर्ड फ्लू के लिए जिला नोडल अधिकारी का चिन्हीकरण किया जाए। जिला स्तरीय रैपिड रिस्पांस टीम और वेंटिलेटर से सुसज्जित सचल चिकित्सादल का गठन किया जाए। निदेशक संचारी रोग, स्वास्थ्य भवन लखनऊ ने यह निर्देश जारी किए हैं।
- शासन द्वारा बर्ड फ्लू के संबंध में जारी की गई गाइड लाइन मिल गई है। हालांकि बर्डफ्लू का कोई मामला जिले में नहीं है, लेकिन फिर भी गाइडलाइन के तहत सतर्कता बरती जाएगी।
- डाॅ. रामवीर सिंह, सीएमओ