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Hathras News: 400 अंत्येष्टि स्थलों पर छत नहीं...प्रशासन ने किया स्वीकार

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अपनों को खोने का दुख बेहद कष्टदायी होता है। जिले में बारिश के दौरान अंतिम संस्कार की प्रक्रिया मृतक के परिजनों का कष्ट और बढ़ा देती है। उन्हें समझ नहीं आता कि वह हाथों से अपने आंसू पोछें या बारिश से चिता को बचाने के लिए उसके ऊपर तिरपाल फैलाकर खड़े रहें।
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जिला प्रशासन के जिम्मेदार ये स्वीकार करते हैं कि बजट की कमी के कारण जिले की लगभग 400 ग्राम पंचायतों में आज भी पक्के अंत्येष्टि स्थल (दाह संस्कार स्थल) नहीं बन सके हैं। गांवों में जमीन की कमी नहीं है लेकिन प्रशासनिक उदासीनता और बजटीय व्यवस्था की धीमी चाल ने मृतकों की आत्माओं को सम्मानजनक विदाई के हक से भी वंचित कर रखा है।

जिले के अलग-अलग गांवों व कस्बों से लगातार ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं जहां श्मशान घाट (अंत्येष्टि स्थल) पर पक्का शेड न होने के कारण परिजनों को चादर या तिरपाल तानकर दाह संस्कार करना पड़ा। ऐसी तस्वीरें और शिकायतें सामने आने के बावजूद जिम्मेदार बजट की कमी की दलील देकर पल्ला झाड़ लेते हैं। ग्रामीण लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि जब तक पक्के शेड का निर्माण नहीं होता, प्रत्येक पंचायत में अस्थायी शेड या वाटरप्रूफ टेंट की व्यवस्था की जाए लेकिन उनकी यह मांग अनसुनी है।
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केस 1 : मांगरू गांव (05 सितंबर)

अनिल (55) की बीमारी से मौत के बाद उनके अंतिम संस्कार के समय तेज बारिश शुरू हो गई। श्मशान घाट पर छत न होने के कारण ग्रामीणों को बांस-बल्ली के सहारे चादर व तिरपाल ताननी पड़ी। चिता को बारिश से बचाने के लिए लोग लगातार चादर पकड़े खड़े रहे।

केस 2 : धौलाकुआं गांव (08 अगस्त)

हाथरस जंक्शन के रम नगला के धौलाकुआं गांव में होमगार्ड हरी सिंह के निधन के बाद अंतिम संस्कार के समय तेज बारिश होने लगी। पक्का शेड न होने की वजह से परिजनों और ग्रामीणों ने तिरपाल पकड़कर किसी तरह अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी की।

केस 3: पवलोई गांव (30 जुलाई )

पवलोई गांव में श्मशान स्थल पर बड़ी-बड़ी झाड़ियां और अव्यवस्था के बीच जब अंतिम संस्कार किया जा रहा था, तभी मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। यहां भी तिरपाल तानकर और कीचड़ के बीच खड़े होकर अंतिम विदाई देनी पड़ी। यहां बरौली निवासी वीरेंद्र सिंह का लंबी बीमारी के चलते निधन हुआ था।

केस 4: वार्ड संख्या 16 - सोखना श्मशान घाट (10 जुलाई )

दो अलग-अलग महिलाओं के निधन पर अंतिम संस्कार के दौरान लगातार बारिश होती रही। सोखना श्मशान घाट पर कोई स्थायी शेड या जल निकासी न होने के कारण परिजनों ने चारों तरफ जलभराव और कीचड़ के बीच तिरपाल पकड़कर अंतिम संस्कार संपन्न कराया।

ऐसे तो 40 वर्ष का समय लग जाएगा

पंचायती राज विभाग के दावों और कार्यशैली पर नजर डालें तो स्थिति की गंभीरता साफ झलकती है।

जिले में पक्के निर्माण वाले अंत्येष्टि स्थल : 62

बजट प्रतीक्षा में ग्राम पंचायतें : लगभग 400

सालाना मिलने वाला बजट : औसत 25 से 30 लाख रुपये प्रति अंत्येष्टि स्थल की दर से मात्र 10 ग्राम पंचायतों के लिए

मौजूदा रफ्तार : यदि इसी गति से नए अंत्येष्टि स्थलों का निर्माण और सुंदरीकरण चलता रहा, तो जिले के सभी गांवों में शेड और चबूतरा बनने में करीब 40 वर्ष लग जाएंगे।

शासन स्तर से जैसे ही बजट व लक्ष्य आवंटित होते हैं, अंत्येष्टि स्थलों के निर्माण के लिए धनराशि जारी की जाती है। ग्राम पंचायतों को खुद से भी अंत्येष्टि स्थलों पर कार्य कराते रहना चाहिए। फिलहाल जिले में 400 अंत्येष्टि स्थलों का निर्माण बाकी हैं।
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-राकेश बाबू, डीपीआरओ।
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