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खेल बिगाड़ सकते हैं निर्दलीय

Tue, 24 Jan 2017 11:21 PM IST
अमर उजाला, अलीगढ़
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राजनी‌ति - फोटो : demo
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अंकुर पंडित
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चुनाव प्रत्याशियों के सामने बागियों के साथ-साथ निर्दलीय भी बड़ी चुनौती बने हुए हैं। निर्दलीय चुनावी सूरमाओं का खेल भी बिगाड़ सकते हैं। पूर्व में सिकंदराराऊ और सादाबाद सीट पर पांच बार निर्दलियों ने चुनाव जीतकर सबको चौंका दिया है। हालांकि हालांकि साल 2002 के बाद से किसी निर्दलीय उम्मीदवार की किस्मत ने उसका साथ नहीं दिया है।

एक बार सादाबाद से तो चार बार सिकंदराराऊ से निर्दलीय प्रत्याशी जीत चुके हैं। सबसे पहले 1957 में सादाबाद विधानसभा सीट से टीकाराम ने पांच हजार से ज्यादा वोटों के अंतर से कांग्रेस के अशरफ अली को हराकर सबको चौंका दिया था।
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इसके बाद सिकंदराराऊ सीट निर्दलियों के लिए भाग्यशाली साबित हुई। लगातार तीन चुनावों में यहां से निर्दलीय प्रत्याशी जीते। 1962 में नेकराम शर्मा ने सिकंदराराऊ विधानसभा सीट पर अपने प्रतिद्वंद्वी नेमसिंह चौहान को 12 हजार वोटों से हराकर यह साबित कर दिया था कि अगर शख्सियत में दम हो तो बिना किसी दल-बल के भी जीता जा सकता है।

नेकराम शर्मा निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में कई बार चुनाव लड़े और उन्हें सिकंदराराऊ की जनता ने सिर पर चढ़ाए रखा। 1967 में भी सिकंदराराऊ से नेकराम शर्मा ने कांग्रेस के ओ. सिंह को सात हजार वोटों से पटखनी दी थी। 1969 में सिकंदराराऊ से जगदीश गांधी निर्दलीय ही जीते थे।

गांधी ने आरपीआई के फरजंद अली को करीब पांच हजार वोटों से हराया था। आखिरी बार 2002 में अमर सिंह यादव ने सिकंदराराऊ विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़कर भाजपा के यशपाल सिंह चौहान को छह हजार वोटों के अंतर से हराया था।

अब तक 420 निर्दलीयों ने लड़ा चुनाव
अभी तक हुए सभी 15 विधानसभा चुनावों में जिले की सभी सीटों पर कुल 420 निर्दलीय उम्मीदवार खड़े हो चुके हैं। इनमें सबसे ज्यादा सादाबाद विधानसभा सीट से 121, हाथरस से 120, सिकंदराराऊ से 115 और सासनी विधानसभा सीट से केवल 64 निर्दलीय प्रत्याशी ही खड़े हुए हैं। सभी सीटों पर सबसे कम प्रत्याशी 1957 में केवल सात और सबसे ज्यादा 1993 में 60 प्रत्याशी खड़े हुए। 1951, 1957 और 2012 में सासनी विधानसभा क्षेत्र न होने के कारण यहां कोई उम्मीदवार खड़ा नहीं हुआ वहीं साल 1962 और 1974 में भी सासनी विधानसभा क्षेत्र से कोई निर्दलीय उम्मीदवार खड़ा नहीं हुआ।
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22 बार दूसरे या तीसरे नंबर पर
आम चुनावों की शुरुआत के समय कांग्रेस का बोलवाला था। हालांकि चुनाव शुरू होने के तीन दशक तक निर्दलीय प्रत्याशियों की झोली में खूब वोट आते थे। वह भले ही जीत नहीं पाते थे लेकिन दूसरे या तीसरे पायदान पर बने रहते थे। चुनावों में 22 बार निर्दलीय प्रत्याशी दूसरे या तीसरे पायदान पर रहे।
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