न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
67 दिन की गहन जांच-पड़ताल के बाद सीबीआई ने उसी थ्योरी को आगे बढ़ाया, जिस पर स्थानीय पुलिस काम कर रही थी। इसमें बिटिया का 22 सितंबर को अलीगढ़ के जेएन मेडिकल कॉलेज में पुलिस के विवेचना अधिकारी सीओ सादाबाद के समक्ष दिया गया बयान ही मुख्य आधार रहा। वहीं, आरोपी पक्ष की ओर से सीबीआई को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिससे कि यह मामला ऑनर किलिंग का होता या सीबीआई की जांच में आरोपी निर्दोष पाए जाते। इन्हीं अहम तथ्यों के आधार पर सीबीआई ने इन चारों आरोपियों के खिलाफ कोर्ट में आरोप पत्र प्रस्तुत किया है।
बिटिया के मामले में जब राजनीति शुरू हो गई और आरोपी पक्ष लामबंद होने लगा था तो आरोपी पक्ष ने इस मामले में सीबीआई जांच की जोर-शोर से मांग की थी। साथ ही पीड़ित पक्ष का भी नार्को टेस्ट कराने की मांग की थी। चौतरफा घिरता देख प्रदेश सरकार ने सीबीआई जांच की सिफारिश कर दी थी। सीबीआई ने 11 अक्तूबर को इस मामले की जांच अपने हाथ में ली। यह तथ्य भी गौरतलब है कि इससे पहले 14 सितंबर को जब बिटिया के साथ घटना हुई थी तो उस समय एक आरोपी संदीप के खिलाफ जानलेवा हमले और एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा कायम किया गया था।
इसके बाद 19 सितंबर को इन्हीं धाराओं में पुलिस ने संदीप को गिरफ्तार भी कर लिया और जेल भेज दिया और धारा 354 भी बढ़ाई। इसके बाद बिटिया ने 22 सितंबर को जब जेएन मेडिकल कॉलेज में उपचार के दौरान विवेचना अधिकारी सीओ सादाबाद बह्म सिंह को बयान दिए। इसके आधार पर इस मामले में सामूहिक दुष्कर्म की धारा 376 डी और बढ़ाई गई और तीन आरोपियों रवि, रामू व लवकुश के नाम भी बढ़ा दिए गए। इसके बाद जब बिटिया की मौत हो गई तो पुलिस ने इस मुकदमे में धारा 302 भी बढ़ा दी। सीबीआई की गाजियाबाद इकाई को इस मुकदमे की जांच मिली।
सीबीआई ने जब इस प्रकरण की जांच की तो अपनी जांच के 67 दिन के अंदर करीब 80 से ज्यादा लोगों से पूछताछ की। बिटिया के गांव के दर्जनों चक्कर लगाए। तत्कालीन सीओ, कोतवाल चंदपा सहित दर्जनों पुलिसकर्मियों, ग्रामीणों से पूछताछ की। जेएन मेडिकल कॉलेज और हाथरस के जिला अस्पताल में जाकर भी छानबीन की। हर पहलू को ध्यान में रखकर पूछताछ की। घटना का सीन रिक्रिएट किया। चारों आरोपियों का गांधी नगर (गुजरात) ले जाकर बीआईओएस प्रोफाइलिंग व पॉलीग्राफ टेस्ट भी कराया। काफी जांच-पड़ताल के बाद सीबीआई को ऐसे सबूत हासिल नहीं हुए, जिससे कि आरोेपी निर्दोष साबित होते। वहीं मृत्यु से पहले इस केस के जांच अधिकारी को दिया गया पीड़िता का बयान अहम बन गया। इसी को आधार बनाकर सीबीआई ने भी पुलिस द्वारा बनाए गए आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट कोर्ट में दाखिल कर दी।
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चश्मदीद छोटू ने मना कर दिया था पॉलीग्राफ, नार्को टेस्ट कराने से
इस केस में खुद को चश्मदीद बताने वाले छोटू से भी सीबीआई ने उसका पॉलीग्राफ आदि टेस्ट कराने की बात कही थी लेकिन छोटू व उसके परिजनों ने पॉलीग्राफ टेस्ट कराने से मना कर दिया था। छोटू को कई बार सीबीआई ने पूछताछ के लिए बुलाया लेकिन उसका बयान भी आरोपियों को निर्दोष साबित नहीं कर सका। वहीं छोटू की आयु को लेकर भी पेंच फंसा रहा। कभी उसे बालिग तो कभी नाबालिग बताया जाता रहा।
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बिटिया के परिजनों ने इंकार किया था पॉलीग्राफ टेस्ट के लिए
इस पूरे मामले में सीबीआई ने बिटिया के परिजनों के समक्ष भी पॉलीग्राफ आदि टेस्ट कराने की बात रखी थी लेकिन बिटिया के परिजनों ने स्पष्ट रूप से इससे इंकार कर दिया था। उनका कहना था कि पीड़ित पक्ष का नार्को या पॉलीग्राफ टेस्ट नहीं होता। तो ऐसे में वह क्यों कराएंगे।
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आरोपी लवकुश अब हो चुका है बालिग
एक आरोपी लवकुश की उम्र को लेकर भी पेंच फंसा रहा। सीबीआई जांच के दौरान उसके परिजन यह बोले कि लवकुश की उम्र 18 वर्ष से कम है। उन्होंने सीबीआई के समक्ष उसकी हाईस्कूल की मार्कशीट पेश की। इसमें उसकी आयु दो दिसंबर 2002 दर्ज थी लेकिन इसे लेकर किशोर न्यायालय में कोई प्रार्थना पत्र नहीं दिया, जबकि स्थानीय पुलिस पहले से ही लवकुश को जेल भेज चुकी थी। ऐसे में उसे बालिग ही माना गया। हालांकि अब लवकुश अपनी हाईस्कूल की मार्कशीट के हिसाब से भी बालिग हो चुका है।