टोक्यो ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम को पदक जिताने वाले पीयूष दुबे हाथरस जिले की तहसील सादाबाद के गांव रसमई के निवासी हैं। उन्होंने भारतीय पुरुष हॉकी टीम को कांस्य पदक जिताकर क्षेत्र का ही नहीं, बल्कि जिले का नाम भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊंचा किया है। वह तीन साल पहले 2019 भारतीय हॉकी टीम में बतौर कोच जुड़़े थे। पीयूष की इस उपलब्धि पर घर में जश्न का माहौल है। बधाई देने वालों भीड़ लगी है।
गांव रसमई निवासी स्वर्गीय गर्वेंद्र सिंह दुबे के बेटे पीयूष दुबे के बड़े भाई श्रवण कुमार दुबे ने बताया कि पीयूष को चाय पीने की आदत थी, लेकिन चाचा धर्मेंद्र को पीयूष की यह आदत अच्छी नहीं लगती थी। उस वक्त पीयूष करीब 14 साल के थे। उनको स्पोर्ट्स से कोई लगाव नहीं था। एक दिन चाचा धर्मेंद्र ने पीयूष से चाय छोड़ने के लिए कहा तो कहा कि वह चाय पीना छोड़ देगा, यदि वह उसे तैराकी सिखा दें। इसके बाद चाचा, पीयूष को रोजाना यमुना नदी में तैराकी का अभ्यास कराने ले जाने लगे, जिससे उसकी चाय छूट गई। बस, यहीं से पीयूष का झुकाव स्पोर्ट्स की तरफ होता चला गया। श्रवण ने बताया कि वह खुद कराटे सीखते थे। उनकी लंबाई कम है। लिहाजा, उन्होंने पीयूष से हॉकी में करियर बनाने के लिए कहा, जिसके बाद वह प्रयागराज के झूसी में हॉकी खेलने जाने लगे। यहां उनकी मुलाकात स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया साईं के कोच प्रेमशंकर शुक्ला से हुई। कोच अपने घर के पास ही हॉकी खेलना सिखाते थे।
एक महीने बाद ही स्थानीय स्तर पर पीयूष को हॉकी टीम का कैप्टन बना दिया। करीब 16 साल की उम्र में पीयूष का चयन इलाहाबाद (प्रयागराज) जिले की टीम में हो गया। इसके बाद स्टेट की टीम में उनका चयन हो गया। वह कई टूर्नामेंट में मैन आफ द मैच भी रहे। इसके बाद पीयूष ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय की टीम की तरफ से खेलते हुए मैन ऑफ द मैच का खिताब जीता। साल 2003 में कोच प्रेमशंकर शुक्ला के कहने पर पीयूष ने पटियाला से एनआईएस का कोर्स किया। कोर्स पूरा होने के बाद उनको इलाहाबाद केंद्रीय विद्यालय, मनोरी में प्रशिक्षक के रूप में तैनाती मिली। यहां दो साल तक प्रशिक्षण दिया। 2005 में उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कोच के रूप में सेवाएं दीं।
साईं कोच की परीक्षा में किया था इंडिया टॉप
पीयूष ने स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (साईं) का कोच बनने के लिए आवेदन किया। इस परीक्षा में पीयूष ने इंडिया टॉप किया। इसके बाद पीयूष बतौर प्रशिक्षक स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया में नियुक्त हुए। यहां उन्होंने सैकड़ों बच्चों को नेशनल और इंटरनेशनल खिलाड़ी के तौर पर प्रशिक्षित किया। उनके बेहतरीन प्रशिक्षण कार्य को देखते हुए स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया की ओवर ऑल टीम का कोच बना दिया गया। इस दौरान भारतीय हॉकी टीम के कोच ग्राहम रीड ने पीयूष से संपर्क किया और टीम इंडिया के कोच के रूप में तीन साल पहले 2019 पीयूष का चयन कर लिया। इसके बाद वह कई देशों में गए और वहां से टीम को मेडल दिलाकर लौटे। आज वह भारतीय टीम को कांस्य पदक जिताने में भी कामयाब रहे।
पिता बनाना चाहते थे आईएएस
कराटे खिलाड़ी श्रवण कुमार दुबे ने बताया कि उनके पिता सरकारी कर्मचारी थे। मां स्नेहलता सरकारी शिक्षक हैं और उनकी खुद की फायर सेफ्टी कंपनी है। परिवार में बहन मनु दुबे हैं। फिलहाल, पूरा परिवार हरियाणा के गुरुग्राम में रहता है। श्रवण कुमार ने बताया कि उनके पिता का निधन मार्च 2008 में हो गया था। पिता का सपना था कि पीयूष आईएएस बने। उन्हों बताया कि पीयूष दुबे की शुरुआती शिक्षा इलाहाबाद से ही हुई। 1995 में हाईस्कूल और 1997 में इंटर की पढ़ाई पूरी की। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एमए अर्थशास्त्र से किया, जिसमें वह गोल्ड मेडलिस्ट रहे। श्रवण ने बताया कि उनके दादा स्वर्गीय खेमकरन सिंह दुबे रेसलर थे और गांव रसमई में जिलेदार थे। ताऊ स्वर्गीय रामखिलाड़ी दुबे सीआईडी इंस्पेक्टर थे, जो हाथरस, आगरा, अलीगढ़ जिले में भी तैनात रहे। पीयूष की ससुराल आगरा जिले के सदरवन में है।
हाथरस : हॉकी टीम के कोच पीयूष दुबे। संवाद- फोटो : SADABAD