न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के लिए हाथरस संसदीय सीट बेहद अहम रही। इसकी मुख्य वजह यह भी रही कि वर्ष 2009 के परिसीमन से पहले इसी संसदीय सीट में कल्याण सिंह का विधानसभा क्षेत्र अतरौली भी आता था। ऐसे में यह संसदीय सीट कल्याण सिंह का वजूद तय करती थी। भाजपा नेतृत्व भी कल्याण सिंह की इच्छा के अनुसार ही इस सीट पर उम्मीदवार खड़े करता और कल्याण सिंह के दम पर भाजपा हर बार यह सीट जाती। वर्ष 2009 के चुनाव को छोड़ दें तो वर्ष 1991 से लेकर पिछले लोकसभा चुनाव तक भाजपा की इस सीट पर जीत एक अहम कारण कल्याण सिंह भी रहे।
कल्याण सिंह का यहां की राजनीति में सीधा दखल था। कल्याण सिंह का यहां की राजनीति में सीधा दखल था। इसकी वजह यह भी थी कि हाथरस जिले का सृजन तीन मई 1997 को हुआ। उससे पहले हाथरस अलीगढ़ जिले का ही हिस्सा था। ऐसे में कल्याण सिंह के गृह जनपद में उन्हीं की तूती बोलती थी। उनका विधानसभा क्षेत्र अतरौली हाथरस संसदीय सीट का हिस्सा था। कल्याण सिंह की मर्जी से ही इस सीट पर भाजपा प्रत्याशी बनाती थी। यह सीट कल्याण सिंह की प्रतिष्ठा का सवाल बन जाती। वर्ष 1991 से लेकर वर्ष 2004 तक भाजपा इस सीट पर कल्याण सिंह की वजह से ही जीती। वर्ष 2009 में जब परिसीमन बदला और अतरौली विधानसभा क्षेत्र हाथरस से अलग हो गया।
इधर, कल्याण सिंह ने भाजपा छोड़ दी तो स्थिति की नजाकत को देखते हुए भाजपा ने इस सीट को रालोद के लिए छोड़ दिया। हालांकि भाजपा के सहयोग से रालोद भी इस सीट पर जीत गया। इसके बाद वर्ष 2014 और वर्ष 2019 के चुनाव में भी कल्याण सिंह की इच्छा के अनुसार ही आलाकमान ने यहां से प्रत्याशी उतारे। एक पूर्व केंद्रीय मंत्री, जोकि कल्याण सिंह के धुर विरोधी माने जाते थे, ने इस सीट पर टिकट हासिल करने का काफी प्रयास किया, लेकिन कल्याण के कद के आगे उनके सारे प्रयास बेकार गए। इसी प्रकार विधानसभा चुनाव में भी जब-जब कल्याण सिंह भाजपा में रहे तो उनकी इच्छा से ही टिकट का वितरण हुआ। भाजपा ने उनके रहते चुनाव में बेहतर प्रदर्शन भी किया।
जिसको मिला आशीर्वाद, उसी का हो गया ‘कल्याण’
हाथरस। इस जिले के काफी नेताओं को कल्याण सिंह का आशीर्वाद मिला और वह चुनाव जीत भी गए। जिले के काफी राजनेता, जोकि सांसद और विधायक बने, वह खुद इस बात को कह भी रहे हैं कि ‘बाबूजी’ के आशीर्वाद से ही हमें टिकट मिला और फिर चुनाव जीते। संवाद