न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
डॉक्टर को भले ही धरती के भगवान का दर्जा दिया गया है, लेकिन बीते कुछ वर्षों से चिकित्सा कार्य में बढ़ती व्यावसायिकता ने मरीज और डॉक्टर के बीच भरोसे के रिश्ते को कमजोर किया है, जबकि यह और मजबूत होना चाहिए। जिले के काफी चिकित्सक अपने परिजनों से दूर रहकर ड्यूटी कर रहे हैं। कोरोेेना काल में इन चिकित्सकों ने अपनी ड्यूटी को बखूबी अंजाम दिया।
दोनों ही पक्षों में तालमेल की जरूरत : सीएमएस
जिला अस्पताल के सीएमएस डॉ. सूर्य प्रकाश ने बताया कि लोगों की चिकित्सकों से अपेक्षाएं बढ़ी हैं, जबकि धरातल पर उतनी सुविधाएं नहीं हैं। सरकारी सेवा के चिकित्सकों को चाहिए कि अपने पास उपलब्ध संसाधनों का भरपूर लाभ जनता को नि:शुल्क दें। लोग इस उम्मीद में अस्पताल आते हैं कि उनकी बात कोई सुनेगा, लेकिन यदि उनसे अच्छा व्यवहार न हो तो उनका विश्वास टूटता है। प्राइवेट चिकित्सक भी रोगियों का हर संभव तरीके से उपचार करें और फीस को संतुलित करने की कोशिश करें। मरीजों को भी समझने की जरूरत है। दोनों ही पक्ष एक-दूसरे की मजबूरियों को समझें तो ही बेहतर होगा।
जैसे-जैसे विज्ञान ने तरक्की की है, चिकित्सकों से मरीजों की उम्मीदें बढ़ी हैं। वे शत-प्रतिशत परिणाम चाहते हैं और जब अपेक्षा के अनुरूप परिणाम नहीं निकलते तो हंगामा एवं मारपीट तक की घटनाएं हो जाती हैं। कई बार कुछ बिना डिग्रीधारकों की लापरवाही से कोई अनहोनी हो जाती है, लेकिन उसका प्रचार ऐसे होता है कि डॉक्टर की लापरवाही से घटना हुई। इससे भी जनता के मन में डॉक्टरों के प्रति नकारात्मक भाव पनपता है। इसका खामियाजा भी चिकित्सकों को भुगतना पड़ता है। आपसी विश्वास को मजबूत करने के लिए दोनों ही पक्षों को समझने की जरूरत है।
-डॉ. केके शर्मा, ईएनटी विशेषज्ञ
हमारे घर चाहे जो भी परेशानी हो, लेकिन अस्पताल आने पर उन सभी परेशानियों को भूलते हुए मरीजों को अच्छे से अच्छा उपचार देते हैं। कोरोना महामारी में चिकित्सकों और पैरामेडिकल स्टाफ का योगदान अतुलनीय रहा है। अपने जीवन की परवाह किए बगैर चिकित्सक मरीजों की सेवा में जुटे हैं। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी है। अगर शासन स्तर से डॉक्टरों की कमी को दूर कर दिया जाए तो मरीजों को इसका लाभ मिलेगा। हमें ईश्वर ने डॉक्टर बनाकर लोगों की सेवा करने का मौका दिया है।
-डॉ. जेके मल्होत्रा, हड्डी रोग विशेषज्ञ
हम अपने परिवार से दूर रहकर अस्पताल में मरीजों का उपचार करते हैं, फिर भी मरीज के साथ वाले कुछ लोग अनावश्यक रूप से दबाव बनाने का प्रयास करते हैं, जोकि गलत है। हम तो यही चाहते हैं कि हमारे पास जो भी मरीज आए वह ठीक होकर जाए। इसी उम्मीद के साथ पूरी निष्ठा से अपनी ड्यूटी करते हैं, क्योंकि जब हम डॉक्टर बने, तब यही सोचा था कि इससे अच्छा सेवा करने का कोई और विकल्प नहीं है।
-डॉ. शबा शाहीन, स्त्री रोग विशेषज्ञ
कोरोना काल में हमने अपनी ड्यूटी को सबसे ज्यादा महत्व दिया। स्वयं का बचाव करते हुए अस्पताल में आने वाले संदिग्ध मरीजों को संभाला। ऐसे में जब हम घर जाते थे तो थोड़ा डर लगता था, फिर भी अपनों को सुरक्षित रखते हुए कोरोना काल में भी अपनी जिम्मेदारी को अच्छे से संभाला और अब भी संभाल रहे हैं। कोशिश रहती है कि मेरे पास जो भी मरीज आए, वह ठीक होकर जाए। अस्पताल में पदों के सापेक्ष डॉक्टरों की कमी है, फिर भी जब भी ड्यूटी होती है, करते हैं।
-डॉ. समन जुबैरी, स्त्री रोग विशेषज्ञ
इसलिए मनाते हैं डॉक्टर्स-डे
एक जुलाई को पूरे भारत में डॉक्टर्स-डे सेलिब्रेट किया जाता है। भारत के महान चिकित्सक और पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री डॉक्टर विधानचंद्र रॉय का जन्मदिन और पुण्यतिथि है। डॉ. रॉय के सम्मान में हर साल एक जुलाई को नेशनल डॉक्टर्स डे मनाया जाता है। 1991 में केंद्र सरकार ने इस दिन को नेशनल डॉक्टर्स-डे के तौर पर मनाने का फैसला किया था।