न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
कोरोना की महामारी और लॉकडाउन ने सामान्य जनजीवन को पूरी तरह से अस्त-व्यस्त कर दिया है। एक मई शुक्रवार को मजदूर दिवस है। इस दिन मजदूरों के हक में तमाम बातें होती हैं और उनकी समस्याओं का बखान भी किया जाता है, लेकिन लॉकडाउन और कोरोना की महामारी से सबसे ज्यादा दुर्दशा का शिकार दिहाड़ी मजदूर है। इन मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का विकट संकट है।
इन मजदूरों से आज तक ऐसा दौर नहीं देखा। शहर में रोजाना सुबह जब सात बजे बाजार खुलता है तो चामड़ गेट, रामलीला मैदान पर यह मजदूर इस आस में आते हैं कि उन्हें कहीं कोई काम मिल जाएगा, लेकिन कुछ घंटे इंतजार के बाद जब कहीं कोई काम नहीं मिलता तो यह लोग निराश होकर वापस लौट जाते हैं। यही देहात में भी यही स्थिति है।
कोरोना की महामारी और लॉकडाउन का सबसे ज्यादा असर मजदूरों पर पड़ रहा है। दिहाड़ी मजदूरी कर अपना जीवन यापन करने वाले हजारों मजदूरों को हफ्तों से कोई काम ही नहीं मिल रहा। शहर के चामड़ गेट चौराहा, सादाबाद गेट, रामलीला मैदान में रोजाना सुबह दिहाड़ी मजदूरों की भीड़ एकत्रित होती थी। राज मिस्त्री से लेकर मजदूरी तक करने वाले लोग वहां आते थे।
काम कराने वाले उन्हें तय मजदूरी के हिसाब से अपने साथ ले जाते थे, लेकिन कोरोना की महामारी और लॉकडाउन ने दिहाड़ी मजदूरों की रोजी-रोटी छीन ली है। स्थिति यह है कि शहर के इन चौराहों पर कुछ मजदूर एकत्रित भी होते हैं, लेकिन उन्हें मजदूरी ही नहीं मिलती। दोपहर 11 बजे के बाद उन्हें पुलिस जरूर अपने घरों पर जाने की चेतावनी देकर वहां से विदा करा देती है। इन मजदूरों का कहना है कि उन्होंने आज तक ऐसा दौर नहीं देखा।
खेतों में काम नहीं मिल रहा तो अब बाजार में आए हैं कि दिहाड़ी मजदूरी मिलेगी लेकिन सब कुछ बंद है। घर में जो कुछ पैसे रखे थे, वह भी खत्म हो गए हैं। आखिर मजदूरी नहीं मिलेगा तो खुद क्या खाएंगे और परिवार को क्या खिलाएंगे।
-रामपाल निवासी खरगू
लॉकडाउन से अब तक कहीं मजदूरी ही नहीं मिली। रोजाना इस आस में शहर आते हैं कि कहीं तो काम मिलेगा लेकिन कहीं काम नहीं मिलता। आखिर कब तक यह हालात रहेंगे। जो कुछ जोड़ कर रखा था, वह सारा खत्म हो गया।
-गंगाराम निवासी नवीपुर
जिले के सैकड़ों मजदूर फंसे हैं अन्य प्रांतों में
हाथरस। स्थिति केवल दिहाड़ी मजदूरों की ही खराब नहीं है। जिले के सैकड़ों लोग मजदूरी करने के लिए अन्य प्रांतों में गए हैं। वह वहीं फंसे हुए हैं। तेलंगाना, कर्नाटक और मध्य प्रदेश सहित कई प्रदेशों में यह लोग फंसे हुए हैं। मजदूरी की तो बात छोड़ दें। इनके सामने समस्या जीवन यापन की आ खड़ी हुई है। यह लोग मजदूरी छोड़ जिंदगी बचाने के लिए अपने गांव व शहर में वापस आने की कोशिश कर रहे हैं। इनके परिजन लगातार प्रशासन से यह गुहार कर रहे हैं कि उनके परिजनों को अन्य प्रांतों से यहां बुला लिया जाए। हालांकि प्रशासन भी इसे लेकर प्रयास कर रहा है और कुछ लोग बाहर से आ भी गए है।