न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
कभी बसपा के वरिष्ठ नेताओं में शामिल रहे जालिम सिंह एडवोकेट का ताल्लुक इस जिले से है और उन्होंने इस जिले में ही राजनीति की है, लेकिन बहुत कम लोग ही जानते होंगे कि वह फिरोजाबाद के पहले जिला पंचायत अध्यक्ष भी रहे हैं। जालिम सिंह अपनी पुरानी यादों को ताजा करते हुए कहते हैं कि उस समय जिला पंचायत अध्यक्ष को मात्र दो हजार रुपये खर्चा मिलता था। अब पंचायत चुनाव बेहद खर्चीला हो गया है और जिला पंचायत अध्यक्ष पद के लिए तो दावेदार करोड़ों रुपये खर्च कर देते हैं।
जालिम सिंह का कहना है कि राजनीति में अब धनबल और बाहुबल का दबदबा है और राजनीति का अपराधीकरण हो गया है। शहर से सटे गांव रानी का नगला के निवासी जालिम सिंह एडवोकेट ने अपनी राजनीति बसपा से शुरू की। बसपा की स्थापना के समय से ही वह इस पार्टी से जुड़े रहे। जब हाथरस अलीगढ़ जिले का हिस्सा था, तब जालिम सिंह 1988 में बसपा के अलीगढ़ के जिलाध्यक्ष और महासचिव दोनों पद पर आसीन रहे। उसके बाद वह बसपा के आगरा मंडल के अध्यक्ष और महासचिव दोनों पदों पर आसीन रहे। जालिम सिंह बताते हैं कि उनकी राजनीति की शुरुआत ही बसपा से हुई।
फिरोजाबाद उस समय जिला बना था, लेकिन वहां जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर निर्वाचन नहीं हुआ था। प्रदेश में वर्ष 1993 में सपा और बसपा की संयुक्त सरकार बनी थी। उन पर बसपा में बेहद अहम जिम्मेदारी थी और पार्टी नेतृत्व उनके काम से काफी खुश था तो इस दौरान वर्ष 1993 में उन्हें फिरोजाबाद का जिला पंचायत अध्यक्ष बनाया गया। वह वहां के पहले जिला पंचायत अध्यक्ष थे। दो साल तक वह इस पद पर रहे।
उनका कहना है कि उस समय जिला पंचायत अध्यक्ष को महज दो हजार रुपये महीने का खर्चा मिलता था। गाड़ी, फोन और कार्यालय की सुविधा थी। अपने कार्यकाल के बारे में वह बताते हैं कि उनके कार्यकाल में वहां 40 प्राइमरी और आठ कन्या जूनियर हाईस्कूल बनवाए गए। इससे बड़ी उपलब्धि तो यह थी कि फिरोजाबाद में कांच उद्योग से जुड़े मजदूरों को 14 से 18 घंटे तक काम करना पड़ता था, लेकिन उन्होंने डीएम व अन्य अधिकारियों के साथ मिलकर ऐसी व्यवस्था कि की इन मजदूरों को आठ घंटे से ज्यादा काम न करना पड़े। तब वहां मजदूरों का शोषण रुक सका।
इसके बाद जब बसपा और भाजपा की संयुक्त सरकार बनी तो जालिम सिंह को हथकरघा बोर्ड का अध्यक्ष भी बनाया गया, लेकिन शपथ लेने से पहले ही यह सरकार गिर गई। जालिम सिंह पिछले 20 साल से सक्रिय राजनीति से दूर हैं। वह यह भी कहते हैं कि उन्होंने बसपा को छोड़कर किसी और दल की राजनीति नहीं की। वर्तमान में राजनीति का स्वरूप बदला हुआ है तो ऐसे स्वरूप में वह राजनीति नहीं कर सकते।