बेहटागोकुल। कस्बा मानपुर में हो रही श्रीमद्भागवत कथा के अंतिम दिन शुक्रवार को आचार्य संतोष भाई ने बताया कि तीन तरह की लक्ष्मी होती है। एक लक्ष्मी धर्म के पथ पर चलकर घर में आती हैं, जो सुख प्रदान करती है।
दूसरी लक्ष्मी स्वार्थ सिद्धि के लिए आती हैं और तीसरी पाप मार्ग से घर में आती है। आपके द्वारा कमाया गया धन परिवार में क्लेश लाता है। वहीं, धन श्रेष्ठ है जो निर्बल दीन-दुखियों की सहायता में लगे।
कहा कि भगवान के भक्त अपने धन का एक हिस्सा धर्म के लिए खर्च करते हैं। वहीं धर्म समस्त भक्तों की रक्षा करता है। श्रीमद्भागवत कथा में राजा नृग की कथा उन्होंने सुनाई।
जिन्होंने अपने धर्म का पालन करते हुए बहुत सा दान किया, लेकिन दान की हुई गाय को अपना मान लिया। इसलिए अगले जन्म में गिरगिटान बनना पड़ा। सुदामा चरित्र की संगीतमय कथा सुनाई गई।
बताया कि सुदामा भगवान का भक्त है और निर्माण है, जो व्यक्ति के बीच अभिमान नहीं है, वह सुदामा बन सकता है। सुदामा भगवान के अनन्य मित्र हैं और उन्होंने भगवान की मित्रता से अपना जीवन भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया।
श्रीमद्भागवत में दत्तात्रेय जी ने कहा कि अपनी बुद्धि के अनुसार बहुत से गुरुओं का आश्रय लिया। कहा कि मेरे गुरु हैं पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, चंद्रमा, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंग, भौंरा या मधुमक्खी, हाथी
शहद निकालने वाला, हरिण, मछली, पिंगला वेश्या, कुरर पक्षी, बालक, कुंआरी कन्या, बाण बनाने वाला, सर्प, मकड़ी और भृंगी कीट। किसी से मैंने धैर्य और क्षमा का पाठ पढ़ा, तो किसी से यह सीखा कि जन्म तो दूसरों का हित करने के लिए ही हुआ है।
किसी से यह कि जीवन निर्वाह हो, उतना ही भोजन करें। कहा कि जल से सीखा कि शुद्ध, स्निग्ध, मधुरभाषी और लोकपावन होना चाहिए। अग्नि से सीखा कि मन और इंद्रियों को वश में रखें। चंद्रमा से सीखा कि सब शरीर के साथ होता है, आत्मा के साथ नहीं।
कहा कि सूर्य से सीखा कि योगी पुरुष समय पर विषयों का ग्रहण करते हैं और समय आने पर उनका दान भी कर देते हैं। इस मौके पर अवधेश सिंह, संतोष सिंह, मनोज गुप्ता, गिरधारी लाल गुप्ता, योगेश कुमार, अवधेश गुप्ता, अजीत सिंह सहित भारी संख्या में श्रोतागण मौजूद रहे।