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किसानों की तकदीर... ‘कचरे के गोबर’ में छिपी

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हरदोई। यकीन मानिए, अगर रोजाना बेकार हो रहे 50 लाख किलो गोबर को इकट्ठा कर रासायनिक खाद बनाने में इस्तेमाल किया जाए तो यही गोबर किसानों के खेतों की तकदीर रातोंरात बदल सकता है, लेकिन जिम्मेदारों की बेखबरी से गोबर महज गोबर ही बनकर रह गया है।
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पशु चिकित्सा विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, जिले में करीब साढ़े 12 लाख मवेशी हैं, जिनका रोजाना औसतन 50 लाख किलो गोबर निकलता है। गोबर का मुख्य रूप से उपयोग उपलों एवं कंड़ों केे लिए किया जाता है और एक समय में हर घर के चूल्हों के लिए लकड़ी के साथ कंडे़ और उपले बड़ी जरूरत रहे हैं, लेकिन गांव-गांव और घर-घर पहुंच रहे रसोई गैस कनेक्शनों ने जरूरत को 50 फीसदी से भी कम कर दिया है।
इसके चलते नगरीय क्षेत्रों के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी मवेशियों का अधिकांश गोबर कचरों के ढेरों में समां रहा है। दरअसल पालतू दुधारू पशुओं एवं उनके लीचरों का गोबर एक जमाने में गांवों से लेकर शहर तक अधिकांश घरों की जरूरत था।
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गोबर से बनने वाले उपले एवं कड़े तो ईंधन के लिए चूल्हे में काम आते ही थे, साथ में घरों के आंगनों से लेकर चबूतरों तक गेरू मिट्टी मिलाकर लिपाई भी होती थी।
इसके अलावा गोबर को एक स्थान पर एकत्र किया जाता था और फसलों की बुवाई के समय सूखने के बाद हल्के गीले हो चुके गोबर को खेतों की जुताई के समय डाल दिया जाता था।
1980 के दशक तक यह कार्य अनिवार्य रूप से होता रहा और दो बैलों की जोड़ी के साथ पालतू पशुओं की चन्नी घर-घर हुआ करती थी।
इस दशक में हुई रासायनिक उर्वरकों की तेज शुरुआत एवं दूध खरीद सेंटरों ने कृषि उपजों का उत्पादन बढ़ाने के साथ ही दूध को व्यवसाय का बड़ा हब बनाना शुरू कर दिया।
नतीजन पालतू पशुओं की संख्या में दुधारू पशु तो बढ़े, लेकिन बैलों की नाकदरी हो गई। ट्रैक्टर और मशीनों ने दो हजार का दशक आते आते खेती किसानी को नया रूप दे दिया।
2020 के दशक में गांवों की तस्वीर मशीनी युग में पूरी तरह से तब्दील हो चुकी है। जिसके चलते दूध न देने वाले पशुओं का पालन करना घाटे का सौदा एवं कंड़ों और उपलों को बनाना समय की बर्बादी लगने लगा है।
इस तरह के गुजरे जमाने की याद करते हुए गांव के बुजुर्ग हरीबाबू एवं आसरे बताते हैं कि गांव जो कभी गोबर से लकदक हुआ करते थे, वहां अब गोबर की पहली जैसी अहमियत नहीं रह गई है।
जिले के मुख्य पशुओं की अनुमानित संख्या
महिषवंश-4,19,966
गोवंश-8,34,744
बकरी-3,78,246
भेड़-17,261
क्या है वर्मी कंपोस्ट
वर्मी कंपोस्ट का अर्थ उस खाद से है, जो कि गोबर एवं केंचुओं से बनाई जाती है।
चार दशक पहले तक खेतों में कृषि उपज के लिए मिट्टी की उर्वरक क्षमता को बढ़ाने के लिए किसान गोबर को एकत्र कर चौमास मतलब बरसात के मौसम तक सुखाकर बारिश होने के बाद खेतों में जुताई के दौरान डालते थे।
दो दशक पहले इसी गोबर खाद को वैज्ञानिक विधि से बनाने और अधिक मिट्टी के लिए पोषण बढ़ाने वाली तकनीक में केंचुओं का इस्तेमाल कर बनाने वाली खाद को वर्मी कंपोस्ट खाद कहा जाता है।
ऐसे बनती वर्मी कंपोस्ट
वर्मी कंपोस्ट खाद को बनाने के लिए दस फीट लंबे एवं तीन फीट चौड़े व दो फीट गहरे पक्के गड्ढ़े बनाए जाते हैं। इसमेें खेत की अच्छी मिट्टी को बिछाकर सतह बनाते हैं।
इसके बाद इसमेें केंचुआ एवं गोबर डाल देते हैं। इस साइज के गड्ढ़े में करीब पांच क्विंटल गोबर एवं तीन से चार किलो केेंचुआ को डाल देते हैं। तीन माह में मिश्रण वर्मी कंपोस्ट खाद का रूप ले लेता है।
शहर के निकट स्थित कृषि विज्ञान केंद्र परिसर में अभी 10 क्विंटल वर्मी कंपोस्ट हर तीन माह में तैयार की जाती है। पिछले दिनों सीडीओ आकांक्षा राना ने परिसर का निरीक्षण करते हुए वर्मी कंपोस्ट के उत्पादन की क्षमता बढ़ाने एवं किसानों को इस ओर जागरूक करने के निर्देश दिए थे।
- डॉ. पृथ्वीपाल सिंह, वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्र
कागजों पर हजारों गड्ढ़े, धरातल पर कुछ नहीं
कृषि विभाग से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, जिले में पिछले एक दशक में हजारों किसानों को वर्मी कंपोस्ट खाद बनाने के लिए प्रोत्साहन स्वरूप प्रति किसान 6,000 रुपये का अनुदान दिया गया।
इस तरह से कागजों पर तो किसानों के वर्मी कंपोस्ट बनाने के गड्ढे आ गए, लेकिन धरातल पर इनका कोई असर नहीं है।
बाजारों से जुड़े सूत्रों का कहना है कि पिछले एक दशक में रासायनिक उर्वरकों की मांग जिले में दोगुने के करीब पहुंच रही, जबकि रबी एवं खरीफ फसलों का रकबा तो लगभग वहीं पर है। साफ है कि किसानों का रासायनिक उर्वरकों की तरफ ही रुझान बना हुआ है।
पशु आश्रय स्थल जगा रहे अलख, बन रही खाद
हमारे 125 पशु आश्रय स्थलों पर 22,000 मवेशी हैं। इन स्थलों पर वर्मी कंपोस्ट का निर्माण शुरू कराया है। हर स्थल पर 10 क्विंटल की क्षमता बनाने का प्रयास है, ताकि वर्ष में हर स्थल से करीब 30,000 क्विंटल खाद का निर्माण हो सके।
इस क्षमता को स्थलों पर निकलने वाले मवेशियों की गोबर की उपलब्धता के हिसाब से बढ़ाने की भी योजना है। अभी तक इन स्थलों से पराली दो खाद लो योजना में किसानों को 500 क्विंटल से अधिक खाद दी जा चुकी है ।
- डॉ. जेएन पांडेय, मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी
एक बीघा रबी की फसल में किसान और 50 किलो यूरिया एवं 20 से 25 किलो डीएपी डालते हैं। जिसकी लागत 2,000 रुपये तक आती है, जबकि इसके स्थान पर वर्मी कंपोस्ट डालने के लिए करीब पांच क्विंटल खाद की जरूरत होगी।
वर्मी कंपोस्ट यदि स्वयं बनाई जाए तो इस पांच क्विंटल की लागत करीब 1,000 रुपये आती है। यदि व्यावसायिक रूप से देखा जाए तो बड़े प्लांट लगाकर केंचुुआ उत्पादन से लेकर गोबर खरीदने आदि मिलाकर एक क्विंटल की लागत ज्यादा आएगी।
वहीं कृषि विज्ञान केंद्र से जुड़े लोगों का कहना है कि वर्मी कंपोस्ट के लिए व्यावसायिक हब बनाने पर रासायनिक उर्वरकों का विकल्प बेहतरीन रूप से तैयार हो जाएगा।
-डॉ. ओम प्रकाश, प्रभारी, कृषि गर्भाधान केंद्र
गोबर खरीद योजना गांवों को दे सकती शक्ति
यदि शहर से लेकर गांवों तक वर्मी कंपोस्ट प्लांट सरकारी या फिर निजी क्षेत्र की भागीदारी से लगाए जाएं और दूूध की तरह गोबर खरीदा जाए तो पशुपालन को बढ़ावा मिलने के साथ ही वर्मी कंपोस्ट की शक्ति गांवों को मिल सकेगी और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटने लगेगी।
अभी शहर से लेकर गांवों तक अधिकांश गोबर कचरे के ढेरों में चला जाता है, क्योंकि अब कंड़े एवं उपलों को पाथने के लिए न तो पहले जैसी जरूरत रह गई और न ही श्रम करने के लिए समय बचा।
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- अनिल कुमार, प्रगतिशील किसान
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