40 लाख से अधिक आबादी वाले हरदोई जिले में आबादी के
लिहाज से 30 फीसदी लोगों केे भी आधार कार्ड नहीं बन सके है। अब तक बनाए गए
आधार कार्डों की संख्या करीब 10 लाख है। खास बात यह है कि प्रशासन के
आंकड़ों में 10 लाख कार्ड बन तो जरूर गए हैं, पर तमाम कार्ड लोगों के हाथों
तक नहीं पहुंचे हैं।
कहीं पता आदि पूर्ण न होने के कारण कार्ड डाक से बंट न
सके, तो कहीं अभी तक कार्ड बनने का नंबर नहीं लग सका है, जिसके चलते लाखों
लोग कार्ड पाने को तरस रहे हैं।
ज्ञात हो कि केंद्र सरकार गरीबों की
कई सब्सिडी वाली योजनाओं के साथ छात्रवृत्ति और मनरेगा मजदूरी एवं गैस
सिलेंडर की सब्सिडी आदि सहित अन्य योजनाओं की सब्सिडी रकम को सीधे लाभार्थी
के बैंक एकाउंट में भेजने का शुरू हो चुका है।
इसके साथ कुकिंग गैस की
सब्सिडी की बैंक एकाउंट योजना शुरू हो चुकी है और अन्य योजनाओं को लागू
करने की तैयारी है। मनरेगा में भी आधार कार्ड को लिंक किया जा रहा है। ऐसे
में आधार लोगों की जरूरत बन गया है। लोगों को आधार कार्ड बनवाने को
कहीं लाइन लगानी पड़ रही, तो कहीं कंपनियों के कर्मियों की मनुहार करनी पड़
रही है।
अव्यवस्थाओं के मकड़जाल में उलझी आधार कार्ड व्यवस्था से
बिचौलियों को मालामाल होने का मौका मिल रहा है। जरूरत के चलते लोग
बिचौलियों के माध्यम से आधार कार्ड बनवाने को विवश हो रहे हैं। उधर, जिले
में आधार कार्ड बनाने के कार्य का कोई एक रूपता वाला आधार दिखाई नहीं दे
रहा है।
आलम यह है कि करीब एक दर्जन कंपनियों ने आधार कार्ड बनाने का ठेका
लेने के बाद कुछ कंपनियों की मनमानी और प्रशासन का लगाम न लगा पाने की
नाकामी ने शासन की मंशा को ही तार तार कर दिया है। हालत यह है कि कंपनियों
द्वारा कार्ड बनाने के लिए अधिकृत लोगों/संस्थाओं के कार्यालय आदि कहां
स्थापित किए हैं।
कहां कहां टीमें काम कर रही हैं, इनका विवरण मुहैया
नहीं है। जिसका जहां मन हो वहां काम रहा है और पैसों की खनक के साथ
बिचौलियों का दखल ही लोगों को आराम दिला पा रहा है। कोई असरदारों के
कहने पर मनचाहे स्थानों पर कार्ड बना रहा, तो मनमानी से लोगों को धक्के
खाने पड़ रहे, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में तो पता नहीं कौन लोग किस तरह से
कार्य कर रहे और वसूली भी की कर रहे है।
ग्रामीण क्षेत्रों में आधार कार्ड
के लिए कैंपों की व्यवस्था की बात दूर जब मुख्यालय पर ही कैंप न लग सके।
जिला प्रशासन ने बेहद जोर शोर के साथ दिसंबर 14 में शहर के पांच स्थानों पर
कैंप लगाकर कार्ड बनाने के निर्देश दिए थे, पर कैंप व्यवस्था पहले ही दिन
धड़ाम हुई तो प्रशासन बैकफुट पर आया और उसके बाद कैंपों की व्यवस्था को
लेकर कोई पहल नहीं हुई, लिहाजा जिसको जहां सुविधा शुल्क देकर या फिर धक्के
खाकर जैसे मौका मिल पा रहा, वैसे कार्ड बनवाने का प्रयास कर रहा है।