हरदोई। सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की नाकामी की कहानी गली मोहल्लों में खुले प्राइवेट अस्पताल बयां करते हैं। इन अस्पतालों में से भी ज्यादातर स्वास्थ्य विभाग में पंजीकृत नहीं हैं। शिकायत मिलने पर स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अफसर कार्रवाई करने का दावा करते हैं। हकीकत यह है कि इन कार्रवाइयों में कोई दम नहीं होती।
नतीजा यह कि कभी अस्पताल का नाम बदलकर तो कभी जगह बदलकर इनका संचालन जारी रहता है। बिना पंजीकरण और चिकित्सक के संचालित अस्पताल मरीजों के लिए काल बन रहे हैं। जनपद में स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों में 184 अस्पताल दर्ज हैं लेकिन गली मोहल्लों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक में इससे कई गुना ज्यादा अस्पताल चल रहे हैं। पेश है इसी पर एक रिपोर्ट ...
प्रकरण-1- मुसलमानाबाद निवासी मानसी के पति संजय कुमार की तबीयत खराब थी। 29 सितंबर को संजय को कछौना के फौजी हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। आरोप है कि ऑपरेशन के बहाने संजय की किडनी निकाल ली गई। ऑपरेशन के 15 मिनट बाद संजय की मौत हो गई। नोडल अधिकारी डॉ. मनोज सिंह ने शिकायत मिलने पर बीते बृहस्पतिवार को छापा मारा। अस्पताल का पंजीकरण नहीं मिला। मौके पर कोई चिकित्सक भी मौजूद नहीं था। यहां अरविंद पासवान मिला जो कोई डिग्री नहीं दिखा पाया।
प्रकरण-2- जसमई खिरौना निवासी शेर सिंह ने अपने पुत्र सूर्यांश (4) को पांच सितंबर को शाहाबाद के माहीबाग में एक अस्पताल में भर्ती कराया था। बिना नाम के संचालित अस्पताल में सूर्यांश की मौत हो गई थी। परिजनों ने गलत इलाज और लापरवाही की शिकायत की थी। शाहाबाद सीएचसी के अधीक्षक डॉ. प्रवीण दीक्षित ने बेनामी अस्पताल को सील कर दिया था। इसके संचालक मुशीह खान के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हुई थी। अस्पताल का पंजीकरण भी नहीं मिला था।
प्रकरण-3- पाली के भगवंतपुर में बिना पंजीकरण नेत्र चिकित्सालय संचालित था। पटियानींव निवासी छोटेलाल कश्यप ने आंख का इलाज इसी चिकित्सालय में कराया था। उनकी आंखों की रोशनी चली गई। डीएम से शिकायत की तो पाली पीएचसी के अधीक्षक डॉ. आनंद शुक्ला ने अस्पताल को सील कर दिया।
जिले में सिर्फ 184 अस्पताल पंजीकृत
यह तीन मामले तो महज उदाहरण के लिए हैं। स्वास्थ्य विभाग का दावा है कि जनपद में 184 प्राइवेट अस्पताल हैं। इनका पंजीकरण विभाग में है। बावजूद इसके हर मोहल्ले और चौराहों पर अस्पताल संचालित है। जब जांच होती है तो इनका पंजीकरण नहीं मिलता। पंजीकरण में दर्ज कराए जाने वाले चिकित्सक भी नहीं मिलते।
पंजीकरण के लिए जरूरी दस्तावेज
-अग्निशमन विभाग की एनओसी।
-जैव चिकित्सा अपशिष्ट निपटान प्रमाण पत्र।
-चिकित्सकाें के पंजीकरण सहित स्वास्थ्य कर्मियों की डिग्री।
-चिकित्सा उपकरण विवरण
-प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से एनओसी।
पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की तकरार में अवैध अस्पताल संचालकों की मौज
बीते बृहस्पतिवार को डॉ. मनोज कुमार सिंह ने फौजी अस्पताल में छापा मारा था। यहां से अरविंद पासवान को अस्पताल संचालित करते पकड़ा था। डॉ. मनोज का दावा था कि अरविंद के पास न तो कोई डिग्री है और न अस्पताल का पंजीकरण। उसे कछौना कोतवाली पुलिस के हवाले कर दिया गया था। बृहस्पतिवार देर रात पुलिस ने अरविंद को बिना किसी कार्रवाई के ही कोतवाली से छोड़ दिया। कोतवाल प्रेम सागर सिंह कहते हैं कि अरविंद पासवान के खिलाफ कोई तहरीर नहीं मिली। डॉ. मनोज सिंह कहते हैं कि संजय कुमार की पत्नी मानसी ने पुलिस को तहरीर दी है। अब पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की तकरार में अवैध अस्पताल संचालक की मौज हो गई।
कभी नाम बदल जाता, कहीं जगह
शहर के स्टेशन रोड पर एक इमारत है। इस इमारत में अस्पताल संचालित होता है। इमारत बनने के बाद से अब तक कई बार यहां अलग-अलग नामों से अस्पताल संचालित किए जा चुके हैं। दावा यह है कि जो भी इमारत को किराए पर लेता है वह अपना अस्पताल चलाता है। कछौना में जिस फौजी अस्पताल में बृहस्पतिवार को छापा मारा गया वह पूर्व में कटियामऊ के पास छप्पर के नीचे संचालित था। यहां कैंसर के मरीजों का इलाज करने का दावा होता था। कार्रवाई हुई तो अस्पताल बंद हो गया। कुछ दिन बाद जगह बदलकर अस्पताल संचालित किया जाने लगा।
अवैध अस्पतालों पर कार्रवाई चिंहीकरण न हाे पाने की वजह से नहीं हो पाती है। जब कोई शिकायत मिली होती या घटना होती है तो कार्रवाई की जाती है। लोग जागरूक होकर अवैध अस्पतालाें के बारे में जानकारी दें तो कार्रवाई जरूर की जाएगी। -डॉ. अखिलेश वाजपेयी, नोडल अधिकारी