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कोरोना काल: रोजाना सुलग रहीं सैकड़ों चिताएं, फिर भी शव वाहनों का अकाल

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हरदोई। जिले के वासियों का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि कोरोना काल में शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में रोजाना औसतन एक सैकड़ा लोग काल के गाल में समां रहे हैं पर सरकारी शव वाहनों के नाम पर जिले में सिर्फ दो वाहन ही हैं।
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अंतिम संस्कार के लिए लोग अपने निजी वाहनों या किराए के वाहनों से शव ढो रहे हैं। इन वाहनों के सैनिटाइजेशन की व्यवस्था न होने के कारण ये वाहन भी कोरोना संक्रमण का कारण बन रहे हैं।
कोरोना काल में बीते माह से लेकर अब तक अकाल मृत्यु खूब हुई हैं। सरकारी तौर भले ही मृत्यु का डाटा एक सीमित संख्या में हो पर जिले के सांडी रोड स्थित मुक्ति धाम, खदरा के निकट स्थित मुक्ति धाम, मेहंदी घाट, राजघाट, सियायर घाट व पांचाल घाट सहित ग्रामीण क्षेत्रों में पुराने श्मसान घाट व बाग आदि में रोजाना सुलग रहीं चिताएं इस बात की गवाह हैं कि औसतन दिवंगत होने वालों की संख्या पूरे जिले में 70 से कहीं अधिक है।
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घाटों के संचालक ही बताते हैं कि पिछले माह रोजाना पहुंचने वाले शवों की संख्या दो से तीन गुनी तक हो गई। मरने वालों में मृत्यु के कारण भले ही कोरोना न हो पर कोई बुखार तो अधिकांश सांस की बीमारी से भी दिवंगत हुए। फिलहाल कहीं न कहीं कारण मौजूद हालात ही हैं।
जिला चिकित्सालय में कोरोना से मरने वालों के लिए भले ही जिला चिकित्सालय के पास दो शव वाहन हैं। जिनके द्वारा शवों को घाट तक अंतिम संस्कार के लिए पहुंचाया जा रहा हो लेकिन नगर निकायों व ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी शवों को घर से अंतिम संस्कार के लिए निजी वाहनों जैसे ट्रैक्टर ट्राली या छोटे डाले आदि से ही ले जाए जाने की विवशता है।
खास बात ये है कि बिना जांच के बुखार व सांस आदि के रोगों के बाद हुई मृत्यु के बाद बिना एहतियात निजी वाहन से शव ले जाने की विवशता है। इन वाहनों को सही से सैनिटाइज भी नहीं कराया जाता है। जिससे कहीं न कहीं संक्रमण फैलने की आशंका है। हैरानी की बात यह है कि जिले के निकायों व ग्रामीण क्षेत्रों में किसी के पास शव वाहन की सुविधा नहीं है।
इन घाटों व मुक्ति धामों में किए जाते अंतिम संस्कार
. सांडी रोड स्थित मुक्तिधाम
. खदरा के निकट स्थित मुक्तिधाम
. मेंहदी घाट
.राजघाट
. सियासर घाट
. पांचाल घाट
.इसके अलावा पुराने शमसान घाट व कब्रिस्तान में भी संस्कार किए जाते हैं।
अंतिम यात्रा के लिए ट्रैक्टर ट्रालियों का ही सहारा
मल्लावां। क्षेत्र के ग्रामीण इलाके में कोई शव वाहन नहीं है। ग्रामीण व नगर के लोग निजी वाहन से ले जाकर शवों का अंतिम संस्कार करते हैं। अंतिम यात्रा में कोविड के नियमों का पालन तो नहीं हो पा रहा है।
मल्लावां क्षेत्र से मेंहदी घाट व उन्नाव जनपद के नानामऊ घाट पर पर शवों का अंतिम संस्कार किया जाता है। मेंहदी घाट पर लंबे समय से गंगा में शव बहाने पर रोक हैं। या तो शव जलाए जाते हैं या फिर दफन किए जाते हैं।
घाटों पर दिखतीं सिर्फ ट्रैक्टर ट्राली
हरपालपुर। ग्रामीण हरिवंश, गोपाल आदि का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में बुखार या सांस की कमी से मृत्यु होना कहीं कम तो कहीं ज्यादा जारी है। गांवों से आज भी शव यात्रा ट्रैक्टर से ही जातीं हैं।
या फिर डाले से। ट्रैक्टर ट्राली को वहां से लौटने के बाद ज्यादा से ज्यादा पानी से ही धो दिया जाता होगा। इससे संक्रमण कहां तक कम होता होगा भगवान जाने। शव वाहन होते तो इस काल में लोग उसी का प्रयोग करते।
रोजाना औसतन आ रहे 35 शव
मल्लावां। मेंहदीघाट पर हरदोई जनपद के शवों का अंतिम संस्कार कराकर पर्ची देने वाले राज नरायन पांडेय ने बताया कि औसतन 30 से 35 शवों का प्रतिदिन अंतिम संस्कार किया जा रहा है। करीब इतने ही शवों का घाट के दूसरे छोर ओर कन्नौज जनपद के शवों का अंतिम संस्कार किया जा रहा है।
मृत्यु का कारण अस्पष्ट तो शवों के संस्कार परंपरागत ढंग से
पिहानी। नगर पालिका परिषद में कोई शव वाहन नहीं है। लोग परंपरागत ढंग से ही अंतिम संस्कार कर रहे हैं। अपेक्षाकृत संख्या में जांच नहीं होने से मारने वालों की मृत्यु के कारण भी अस्पष्ट होते हैं। पिछले दो सप्ताह के दौरान कई मौतें हुईं। ईओ अहिबरन लाल के अनुसार पालिका के पास कोई शव वाहन नहीं है।
शव वाहन की जरूरत नहीं महसूस हुई
हरदोई। ईओ रविशंकर शुक्ल का कहना है कि जिला चिकित्सालय में दो शव वाहन हैं। इसके अलावा जिला चिकित्सालय के बाहर दो निजी बड़े वाहन व तीन छोटे भी शव वाहन हैं। जिनसे पीड़ित परिवार शव को ले जाते रहे हैं। पालिका के पास शव वाहन की कोई सुविधा नहीं है।
सैनिटाइज कभी कर लेते कभी नहीं
हरदोई। जिला चिकित्सालय के बाहर निजी शव वाहन संचालक काजू का कहना है कि काम तो लगातार मिल रहा है। बाहर घाटों पर कम लोग शहर के ही मुक्ति धाम लेकर शवों को जा रहे हैं। या फिर गांवों के बाग आदि तक। चूंकि जाने वाले लोगों की संख्या कम रहती और वाहन भी शव वाहन ही है तो सैनिटाइज कभी कभार कर लेते हैं। बाकी तो नहीं करते। खुद के हाथ सैनिटाइज करते रहते है।
सैनिटाइज कराते रहते मुक्तिधाम: ईओ
ईओ रविशंकर शुक्ल का कहना है कि उनके संज्ञान में यह आया था कि अंतिम संस्कार को मुक्तिधाम पहुंचने वाले लोग किटें आदि यदि पहन कर जाते हैं या शव के वस्त्र आदि वहीं फेंक देते हैं तो उसको लेकर वह समय समय पर वहां का सैनिटाइजेशन कराते रहते हैं।
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