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धर्मविहीन व्यक्ति पशु के समान होता : संतोष

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बेहटागोकुल। कस्बा मानपुर में चल रही भागवत कथा में रविवार को आचार्य संतोष भाई ने बताया कि उपनिषद् के सार तत्व को वेदांत कहते हैं। ज्ञान, भक्ति और अपने संपूर्ण कर्मों में भगवान की शरणागति का भाव, यही उपनिषदों का निहितार्थ है।
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बताया कि ज्ञान का अर्थ प्रचुर अध्ययन से होने वाला गंभीर आध्यात्मिक ज्ञान नहीं, अपितु अनुभव और गुरुजनों के उपदेश एवं आचरण पर ध्यान देने से प्राप्त होने वाली सम्यक दृष्टि है।
सत्य क्या है और असत्य क्या है, महान क्या है और क्षुद्र क्या है, हमें क्या स्मरण रखना चाहिए और क्या भूल जाना चाहिए इस बात को जानना आवश्यक है।
इसी का नाम ज्ञान है और यह ज्ञान हमारी समस्त क्रियाओं का कर्म में अनासक्ति का भाव आता है।
हम कर्तव्य से मुंह न मोड़ें, अपितु समस्त प्राप्त कर्म अनासक्त होकर और इस बात पर दृष्टि रखते हुए कि किस बात में जगत का हित है और किस में जगत का अहित है, उसकी अनुभूति होनी चाहिए।
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कहा कि हमारी क्रिया स्वार्थ और अपने लाभ के लिए न हो। उन्होंने कहा कि हर सनातन धर्मावलंबी को अपनी परंपरा और संस्कार का पालन करना चाहिए। धर्म के प्रति समर्पण का भाव ही इंसान के प्रगति का मार्ग खोलता है।
धर्म से ही व्यक्ति का अस्तित्व जुड़ा होता है। धर्मविहीन व्यक्ति पशु के समान होता है। धर्म व संस्कार की रक्षा के लिए सर्वस्व न्योछावर करने का भाव हर व्यक्ति को रखना चाहिए।
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इस मौके पर छोटे सिंह, विनोद पंडित, सत्यपाल रठूर, बाबू राठौर, रामप्रकाश सिंह, विजयपाल सिंह, रामलखन मिश्र आदि मौजूद थे।
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