हरदोई। विधानसभा चुनाव के लिए बज रही रणभेरी में जिले के सभी आठ सीटों पर 23 फरवरी को मतदान होना है। इसके लिए निर्वाचन आयोग के दिशा निर्देश में जिला प्रशासन ने लगभग सभी जरूरी तैयारियां पूरी कर ली हैं।
उधर, कोविड गाइडलाइन और चुनाव आचार संहिता को देखते हुए चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी भी प्रचार और वोटरों तक पहुंच के लिए इस सर्द मौसम में पसीना बहा रहे है।
इन सबके बीच आम मतदाता खामोश तो वहीं चुनावों में हमेशा चर्चा में रहने वाली दावतें जोर नहीं पकड़ पा रही है। दावतों के शौकीन एवं खासतौर पर चुनावी मौसम के इंतजार में रहने वालों का मौसम अबकी खाली खाली सा हैै।
उनका हाल सुबह और शाम दावतों की राह ताकने का इंतजार सिर्फ इंतजार बन कर रह गया और अरमान बस दिलों तक सिमट कर रह गए हैं।
पिछले लंबे समय से चुनावों की समीक्षा एवं सियासत का गुणा-भाग लगाकर हिसाब रखने वाले लोग कहते हैं कि इस बार के चुनाव के हालात बदले बदले से नजर आते हैं। कोविड प्रोटोकाल की बंदिशों ने चुनावों को रंगत में आने नहीं दिया।
कहते हैं कि चुनाव हो और दावतें न हों, ऐसा तो पहले कभी हुआ नहीं, अबकी ऐसा हो रहा है। अबकी तो बहाने से भी दावतें नहीं हो पा रही हैं। दावतें खास का आयोजन खास लोगों के लिए खास इंतजाम के साथ हुआ करता था।
जब से चुनाव आयोग ने इस ओर कार्यवाही का डंडा चलाना शुरू किया तो यह हल्का पड़ा और बड़े आयोजन का रूप छोटे आयोजन ने ले लिया, पर अबकी के चुनाव के यह चलन चुनाव से बाहर होते दिखाई पड़ रहे हैं।
कोरोना का खौफ एवं कार्यवाही का डर का ही नतीजा है कि अबकी खुलेआम दावतों का कहीं कोई शोर और जोर नजर नहीं आ रहा। हर क्षेत्र में दावतों के शौकीन लोगों के लिए चुनावी मौसम बेहद खास हुआ करता था।
चुनाव अवधि दावतें और चर्चा पर्चा की पंचायतें आम हुआ करतीं थी, मगर अब यह सब बहुत पीछे छूट रहा, लिहाजा दावत की दवाई घरों तक सिमट रही हैं।
जिसने जितनी पिलाई, उतनी ज्यादा बड़ाई
एक दौर था, जब लोग खुले आम कहते थे कि जिसने जितनी पिलाई उसकी उतनी ज्यादा बड़ाई, मतलब पीने की दवाई का चुनावी रंग खूब हुआ करता था।
लोग कह देते थे क्या होगा रबड़ी और मिठाई से, मौसम बनेगा तो सिर्फ पीने की दवाई से। ऐसा नहीं है कि पीने की दवाई के शौकीनों के चुनावी मौसम बिल्कुल बदल गए, लेकिन बारिश के जैसे रंग बूंदाबांदी के स्तर तक जरूर पहुंच गए हैैं।
दावतें कम, तो आलू बेदम
चुनावों में दावतों का चलन इस कदर हुुआ करता था कि चुनाव कोई हो, मगर चुनाव अवधि में आलू की डिमांड बहुत ज्यादा बढ़ी थी, क्योंकि दावत कोई हो आलू बिन सब बेकार, पर अबकी बार के चुनाव में सब्जियों के राजा आलू बेजार सा ही है।
आलू का सीजन चल रहा और अब आलू खेतों में तैयार होने की ओर बढ़ रहा, तो चुनाव भी कुछ दिनों का ही शेष रह गया है। सूत्रों ने बताया कि आलू की कीमतों में इस बार कोई खास उतार चढ़ाव नहीं आया है।
कैमरे की नजर का बड़ा असर
सोशल मीडिया की पहुंच गांवों तक हो चुकी है और स्मार्ट फोन लोगों के हाथ में हैं। ऐसे में कैमरे की जद में अब सब कुछ है सो दावतें हो या फिर और कुछ गुपचुप रह पाना आसान नहीं रह गया।
निर्वाचन आयोग ने भी आनलाइन एप एवं शिकायती नंबर जारी करके लोगों को शिकायतें पहुंचाने का जरिया बड़ा बना दिया है। यही सब वजह हैै कि इन सबके डर का बड़ा असर हुआ है।