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जिले में जैविक खेती पर होगा शोध, प्रदेश में लागू होगा हापुड़ का मॉडल

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जिले में जैविक खेती पर होगा शोध, प्रदेश में लागू होगा हापुड़ का मॉडल
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हापुड़। जैविक और परंपरागत खेती को लेकर छिड़ी बहस अब जल्द ही समाप्त हो जाएगी। किस पद्धति से खेती करने में अधिक आमदनी और कम व्यय है, इसका खुलासा आने वाले दो से तीन सालों में कृषि विज्ञान केंद्र करेगा। शासन के आदेश पर जनपद में प्रोजेक्ट शुरू हो रहा है, 3600 वर्ग मीटर जमीन कृषि विज्ञान केंद्र ने चिन्हित की है, जिसे तीन भागों में बांटकर शोध होगा। देसी गाय केंद्र पर पहुंच गई है, हापुड़ के मॉडल को प्रदेश में लागू कराने की तैयारी है।
रसायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग से मृदा का स्वास्थ्य बिगड़ रहा है। गोष्ठी, किसान मेलों में जैविक खेती पर जोर दिया जाता है। लेकिन जैविक, प्राकृतिक खेती पर अभी तक कोई शोध नहीं हुआ है, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि इस पद्धति की खेती कितनी लाभप्रद है और परंपरागत खेती को यह कैसे चुनौती दे सकती है। बढ़ती बीमारियों के बीच लोग जैविक सब्जी, फलों की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे में सरकारें भी इस खेती पर ध्यान दे रही है।
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जैविक और परंपरागत खेती में आय, व्यय की स्थिति का जायजा लेने के लिए अब शासन ने शोध कराने का निर्णय लिया है। इसके लिए हापुड़ के कृषि विज्ञान केंद्र को गाइडलाइन जारी की गई है। केंद्र के वैज्ञानिक तीन श्रेणियों जैविक, प्राकृतिक, परंपरागत खेती का ट्रायल करेंगे। यह ट्रायल 1200 -1200 वर्ग मीटर जमीन पर किया जाएगा। प्रतिदिन मृदा में पोषक तत्वों की स्थिति का जायजा लेकर, रिपोर्ट तैयार होगी।
नोडल अधिकारी नामित
तीनों कृषि पद्धतियों के शोध को पूरा करने के लिए कृषि विभाग केंद्र के दो वैज्ञानिकों को नोडल अधिकारी नामित किया है। इसमें पशु वैज्ञानिक डॉ पीके मड़के, मृदा वैज्ञानिक डॉ अशोक सिंह शामिल हैं।
लागत और मुनाफे की तैयार होगी रिपोर्ट
दो से तीन साल तक चलने वाले शोध में तीनों कृषि पद्धतियों से खेती करने पर आने वाली लागत व फसल उत्पादन की रिपोर्ट तैयार होगी। साथ ही फसल की गुणवत्ता का भी आंकलन किया जाएगा। यही रिपोर्ट मॉडल का आधार भी बनेगी।
गंगा किनारे जैविक खेती पर जोर
गंगा किनारे के गांवों में जैविक खेती पर जोर दिया जा रहा है। इसके लिए सैकड़ों हेक्टेयर रकबा कृषि विभाग ने चिन्हित किया है। जैविक उर्वरकों के प्रयोग से ही यहां फसलें उगाई जा रही हैं। यहां की बागवानी भी जैविक तरीके से ही
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तीन श्रेणियों में होंगे ट्रायल
* जैविक खेती - वर्मी कंपोस्ट, गोबर का खाद, हरी खाद का प्रयोग कर फसल उगाई जाएंगी।
* प्राकृतिक खेती- बीजामृत, घनजीवामृत, जीवामृत, नीमास्त्र, अग्नि अस्त्र, ब्रह्मास्त्र, दशपर्णी अर्क का प्रयोग कर फसल उगाई जाएगी।
* परंपरागत खेती- रासायनिक उर्वरकों के जरिए फसलें उगाई जाएंगी।
कोट-
जैविक, प्राकृतिक, परंपरागत खेती को लेकर शोध जल्द शुरू कर दिया जाएगा। जमीन चिंहित कर ली गई है, तीनों पद्धतियों की खेती 1200-1200 वर्ग मीटर जमीन पर होगी। इस शोध के जरिए ही कौन सी खेती सबसे लाभकारी, इसका पता चल सकेगा। - डॉ.अशोक कुमार, मृदा वैज्ञानिक।
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