राष्ट्रीय राजमार्ग पर अनवरपुर गांव के पास करीब 25 करोड़ की संपत्ति वाले प्रादेशिक कोआपरेटिव डेयरी फाउंडेशन (पीसीडीएफ) के प्लांट और कार्यालय पर संस्था के पदाधिकारियों और अफसरों की लापरवाही के कारण कई महीनों से ताले पड़े हैं।
प्लांट के फिलहाल चालू होने की कोई उम्मीद नहीं है। इस समय जिलेभर से एकत्रित हो रहे सिर्फ 3 हजार लीटर दूध और यहां तैनात स्टाफ को परतापुर डेयरी में शिफ्ट कर दिया गया है। यह बात अलग है कि मुनाफा शून्य रह जाने के बाद भी पीसीडीएफ पर अधिकारी लाखों रुपये खर्च कर रहे हैं
जबकि इस संघ का अस्तित्व ही समाप्त होकर मेरठ के संघ में मर्ज कर दिया गया है। गनीमत है कि दुग्ध उत्पादकों के करोड़ों रुपये का भुगतान प्रदेश सरकार के अनुदान से हो गया।
पीसीडीएफ का अनवरपुर प्लांट लगभग 12500 वर्ग मीटर भूमि पर स्थापित है।
इस प्लांट के परिसर में दूध का चिलिंग प्लांट, दूध की पैकिंग मशीन, शीतगृह, पशुओं के रातब और दवाइयों के लिए गोदाम के अलावा एक प्रशासनिक भवन भी बना है। अगर सिर्फ इस प्लांट की भूमि की कीमत का आंकलन किया जाए तो वह कम से कम 25 करोड़ रुपये की है।
इतना ही नहीं पीसीडीएफ की अपनी बिजली लाइन खींचकर यहां ट्रांसफार्मर भी लगा है। अगर अब इस कनेक्शन को नया लिया जाए तो एक करोड़ रुपये का खर्च आएगा। हापुड़ के जिला बनने से पहले भी पीसीडीएफ हापुड़ (गाजियाबाद) के नाम से ही चलता था।
करीब 8 साल पहले तक पीसीडीएफ के अधीन इन दोनों जिलों में करीब 300 दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियां संचालित थीं, जिनके करीब 10 हजार दुग्ध उत्पादक किसान सदस्य थे। इन समितियों से करीब 30 हजार लीटर दूध एकत्रित होता था,
जिसकी इसके प्लांट में पैकिंग कर सप्लाई की जाती थी और घी बनाकर भी बेचा जाता था। लेकिन अफसरों, संघ के पदाधिकारियों की लापरवाही और प्राइवेट डेरियों की धमक के सामने पीसीडीएफ धीरे-धीरे धरातल में पहुंच गई।
चार साल पहले तक दुग्ध उत्पादक किसानों का करीब दो करोड़ रुपये बकाया हो गया था जिसको लेकर किसानों ने दूध प्राइवेट डेरियों पर देना शुरू कर दिया। शुक्रवार को अनवरपुर प्लांट पर मिले संघ के एकाउंटेंट कृपाल सिंह ने बताया कि
प्रदेश सरकार ने किसी तरह किसानों के बकाया का पिछले साल ही लगभग पूरा भुगतान करा दिया। हापुड़ जिले में करीब 35 समितियां संचालित रह गयीं, जिन पर कुल लगभग 3 हजार लीटर दूध एकत्रित होता था।
इस पर अनवरपुर प्लांट पर ताला डालकर दूध की सप्लाई पीसीडीएफ परतापुर (मेरठ) डेयरी को की जाने लगी और वहीं यहां का तमाम स्टाफ शिफ्ट कर दिया गया। यहां खुला दुग्ध पार्लर भी बंद कर दिया गया है।
पीसीडीएफ के प्लांट पर ताला लगने की एक बड़ी वजह प्राइवेट डेरियां भी हैं। जिले में पारस, मधुसूदन, नागर और मदर डेयरी के दुग्ध संग्रह केन्द्र हैं। इन पर रोजाना लाखों लीटर दूध की आवक है।
वजह, यह डेरियां हर सप्ताह भुगतान करती हैं। इनका रेट भी पीसीडीएफ से प्रति लीटर चार से पांच रुपये ज्यादा होता है। ऐसे में समय पर भुगतान और अच्छा मूल्य मिलने के कारण किसान प्राइवेट डेरियों को ही दुग्ध देते हैं।