फोटो 07 एचएएमपी 08- मौन चराने जाते मौन साधक। फाइल फोटो
भरुआ सुमेरपुर। बुंदेलखंड में दिवाली पर भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति से जुड़ी मौन चराने की प्राचीन परंपरा आज भी गांव-गांव में निभाई जा रही है। इस परंपरा के तहत मौन साधक 36 घंटे का कठिन व्रत रखकर भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अपनी आस्था जताते हैं। व्रत अमावस्या की सुबह स्नान और मोरपंखों के पूजन के साथ शुरू होकर प्रतिपदा की शाम को समाप्त होता है। अमावस्या को मौन साधक नदी या सरोवर में स्नान कर मोरपंख धोते हैं और व्रत का संकल्प लेते हैं।
प्रतिपदा को सुबह गायों का पूजन करने के बाद मौन रहकर गांव के मठ-मंदिरों में दर्शन-पूजन करते हैं। शाम को सामूहिक रूप से गायों का पूजन कर जयकारे के साथ मौन व्रत खोलते हैं। इसके बाद महिलाएं उन्हें मिष्टान्न और शरबत पिलाकर पारण कराती हैं। यह परंपरा 14 वर्षों तक निभाई जाती है। पहले 13 वर्ष गांव में व्रत रखने के बाद 14वें वर्ष मौन साधक वृंदावन जाकर यमुना स्नान और गोवर्धन परिक्रमा करते हैं। इस दौरान साधक नशा, मांसाहार तथा सूतक के भोजन से परहेज करते हैं।
आचार्य जुगल किशोर पाठक के अनुसार, इस परंपरा में सर्व समाज के लोग शामिल होते हैं। गाय पूजन इसका प्रमुख हिस्सा है। साधक प्रतिपदा को गायों के चरने के लिए फसलें दान करते हैं, जिन्हें मौन चरागाह कहा जाता है।