स्थानीय निकाय के खाते के एमएलसी चुनाव के लिए वैसे तो सपा से कई नेताओं ने मजबूत दावा रखा था लेकिन पार्टी ने मौका दिया पिछले एमएलसी चुनाव में सपा के लिए ही चुनौती खड़ी करने वाले पूर्व मंत्री जयप्रकाश यादव पर। माना जा रहा है कि निकाय खाते के एमएलसी चुनाव में पिछली दफा भले ही जयप्रकाश यादव सपा प्रत्याशी के मुकाबले चुनाव मैदान में उतरे थे लेकिन उससे पहले और एमएलसी चुनाव के बाद सपा के प्रति उनकी निष्ठा और जिले के सपा नेताओं का भरोसा टिकट की दौड़ में उनकी मजबूती का आधार बने।
2002 में बसपा के टिकट पर धुरियापार से विधायक बनने के करीब दो साल बाद से ही जयप्रकाश यादव की नजदीकियां सपा से बढ़ने लगी थीं। राजनीतिक रणनीतिकार मानते हैं कि बसपा नेतृत्व को जब इसकी भनक लगी तो कुछ मामलों में घेरकर उन पर मुकदमा दर्ज करा दिया गया। इसके चलते उन्हें जेल जाना पड़ा लेकिन सपा के प्रति लगाव का माद्दा नहीं घटने दिया। यही वजह रही कि 2005 में जब सपा सत्ता में आई तो जयप्रकाश यादव को मंत्री की कुर्सी से नवाजा गया।
साल 2007 में सहजनवां क्षेत्र से उन्होंने विधानसभा का चुनाव लड़ा लेकिन कामयाबी नहीं मिली। फिर बारी आई 2010 के एमएलसी चुनाव की, जिसमें सपा ने उनकी बजाय सीपी चन्द पर भरोसा जताया। इस फैसले से नाखुश होकर जयप्रकाश यादव ने सपा उम्मीदवार के खिलाफ ताल ठोक दी। हालांकि वह एमएलसी बनने में कामयाब नहीं हुए लेकिन सपा उम्मीदवार की हार का सबब जरूर बन गए। इसके बाद के वक्त में सपा के वरिष्ठ नेताओं से मेल-मुलाकात में गिले-शिकवे दूर हुए तो साल 2014 के लोकसभा चुनाव से वह फिर सपा के हक में सक्रिय हो गए। हालिया जिला पंचायत के चुनाव में सपा ने जहां उनकी बेटी ललिता को चुनाव लड़ने का मौका दिया, वहीं ललिता के कामयाब न होने पर जयप्रकाश यादव को एमएलसी चुनाव के लिए उम्मीदवार घोषित किया है।
अभी तक के चुनावी नतीजों में सूबे की सरकार वाले दल की इस सीट पर जीत का इतिहास देखकर जहां जयप्रकाश यादव के समर्थक सफलता तय मान रहे हैं, वहीं संगठन के पदाधिकारी टिकट से पहले की कवायद में खुद की रायशुमारी कामयाब होती देख उत्साहित हैं। अलबत्ता दूसरे दलों के उम्मीदवार और उनकी रणनीति भी बहुत कुछ तय करेगी।