हाल में ही आक्सीजन टैंक बदलने के दौरान लगी आग के बाद भी मेडिकल कॉलेज प्रशासन आक्सीजन सप्लाई को लेकर सतर्क नहीं है। इसकी बानगी कॉलेज परिसर में लगे लिक्विफाइड आक्सीजन टैंक के पैनल पर जमी बर्फ में देखी जा सकती है। हद तो यह है कि जिम्मेदार इससे बेखबर हैं कि यह बर्फ किसी खतरे का न्यौता है, जबकि कॉलेज के एसआईसी का कहना है कि उन्हें इस तरह की कोई जानकारी ही नहीं है।
तकनीकी विशेषज्ञ के मुताबिक टैंक से सप्लाई होने वाला ऑक्सीजन तरल है, इसलिए यह बर्फ उसे जमा सकती है। इससे आक्सीजन की अबाध आपूर्ति में बाधा होगी और यह रुक-रुककर मरीज तक पहुंचेगा। इससे आपूर्ति ठप भी हो सकती है। ऐसे में कृत्रिम आक्सीजन के सहारे रखे गए मरीजों की जान को खतरा हो सकता है।
गर्मी के मौसम में चूंकि वातावरण का तापमान अधिक होता है, इसलिए बर्फ जमने की दिक्कत नहीं आती है। यह समस्या ठंड के मौसम में ही होती है। विशेषज्ञ ने बताया कि इसका एकमात्र उपाय पैनल पर लगातार पानी डालते रहना है। बर्फ जमने की वजह पूरी तरह से लापरवाही और बदइंतजामी है।
सूत्रों के मुताबिक टैंक की देखरेख की जिम्मेदारी फिलहाल उसे स्थापित करने वाली एजेंसी के हाथ में है और उसने इसके लिए केवल एक व्यक्ति की तैनाती की है। अब एक ही व्यक्ति लगातार देखरेख कैसे कर सकता है, इस सवाल का जवाब जिम्मेदारों के पास भी नहीं है।
मरीजों तक सीधे आक्सीजन पहुंचाने की केंद्रीकृत व्यवस्था के लिए कॉलेज में लिक्विफाइड आक्सीजन टैंक पिछले साल स्थापित किया गया। इससे जहां आधी कीमत पर मरीजों तक आक्सीजन पहुंचने लगा, वहीं सिलिंडर व्यवस्था से कॉलेज प्रशासन को काफी हद तक निजात मिल गई, लेकिन साल भर में ही इसे लेकर बरती जाने वाली लापरवाही कॉलेज की व्यवस्था पर सवाल उठाती है।
पैनल की देखरेख का क्या इंतजाम है, इस बाबत मुझे कोई जानकारी नहीं है। अगर पैनल पर बर्फ जमी है तो यह निश्चित तौर पर लापरवाही है। जिसे देखरेख की जिम्मेदारी सौंपी गई है, उससे बात करके इस समस्या का निदान कराया जाएगा।
- प्रो. राम कुमार, एसआईसी, मेडिकल कॉलेज