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नौकरी गई, बेटी की शादी टूटी और घर की बचत जमानत में हो गई खर्च

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फर्जी शस्त्र लाइसेंस वाली खबर में बातचीत ----पीड़ित जगदीश शुक्ला पत्नी बवीता, लड़का अजय,लड़की अंकिता।
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नौकरी गई, बेटी की शादी टूटी और घर की बचत जमानत में हो गई खर्च
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गोरखपुर। सुरक्षा और शौक के लिए खरीदे गए असलहे की वजह से जेल भेजा गया तो खुद पर यकीन नहीं हो रहा था। समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर हमारी गलती क्या है। एक बार तो यही लगा कि असलहा ही क्यों खरीदा। पहले लाइसेंस पाने के लिए अफसरों के दफ्तरों के चक्कर काटे। सबकी जेबें गरम कीं। फिर लाइसेंस पाने के सालों बाद जेल भेज दिया गया। बेगुनाह होते हुए भी जेल में इस तरह से डाला गया जैसे अपराधी हैं। गुनाह प्रशासन का था कि उनके पास कोई रिकॉर्ड ही नहीं था। पुलिस से दुहाई देते तो वह प्रशासनिक रिपोर्ट का हवाला देती, मगर गलती साहब किसी की भी हो झेलना तो हम लोगों को ही पड़ा। बाप, दादा के जमाने से समाज, रिश्तेदारी में बनी प्रतिष्ठा सब खाक में मिल गई। नौकरी चली गई, बेटी की शादी टूटी और जमा पूंजी जमानत के लिए दौड़भाग में खर्च हो गई। रिश्तेदार ताना मारते हैं। अब खुद को सही बताने के लिए प्रशासन से लड़ रहे हैं। बस एक ही सवाल है। आखिर हमारी खोई प्रतिष्ठा कैसे लौटेगी? इन पीड़ितों की खोई प्रतिष्ठा लौटाने का ‘अमर उजाला’ का यह विनम्र प्रयास है। प्रयास है कि लोग पीड़ित और उनके परिवार की उन तकलीफों को जानें, जो बेगुनाह होते हुए उन्होंने भुगती ताकि पीड़ितों को जनसमर्थन मिले। पीड़ितों के बेहद कड़वे अनुभवों को संवाददाता अरुण चंद, शिवम सिंह, खोराबार प्रतिनिधि गंगा शरण त्रिपाठी और कुसम्ही प्रतिनिधि विश्व प्रकाश शुक्ला ने दिल से महसूस किया और कागज पर ज्यों का त्यों उतार दिया। पेश है रिपोर्ट, तो आप भी महसूस कीजिए।
बस, यही अपराध था, नौकरी के लिए बंदूक ली थी
नौकरी की तलाश थी। परिवार की जरूरतें पूरी करनी थी। एक कंपनी में बात हुई तो बताया गया कि अगर बंदूक हो तो गार्ड की नौकरी दे सकता हूं। बस इसी जरूरत के लिए लाइसेंस का आवेदन किया। दौड़ भाग करने के बाद एक फरवरी 2002 को एकनाली बंदूक का लाइसेंस मिला। जैसे तैसे पाई-पाई जोड़ करके बंदूक खरीदी, तब आठ हजार रुपये महीने की नौकरी मिली। उसी से घर चल रहा था। बड़ी बेटी की शादी तय की थी, इस साल शादी करनी थी। बेटी के हाथ पीले करने के लिए पाई-पाई जोड़ी थी, मगर सब बर्बाद हो गया। पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। जेल जाने की वजह से नौकरी भी छूट गई। बेटी की शादी के लिए रखे रुपये जमानत में खर्च हो गए। मेरे जेल जाने और समाज में बदनामी की वजह से बेटी की शादी ही टूट गई।
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जगदीश शुक्ला, भैंसहा (जर्दा)
सस्पेंड हुए, सैलरी रुकी है, इज्जत तो चली ही गई
समाज कल्याण विभाग में बाबू की नौकरी में रहकर बड़ी मुश्किल से इज्जत कमाई थी। पुलिस ने इस तरह से गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। जैसे हम लोग हत्यारे हों। हमारी एक नहीं सुनी गई। जेल जाने की वजह से सस्पेंड हो गए। आज भी सैलरी नहीं मिल रही है। परिवार चलाना है। समाज में इज्जत जाने के साथ ही घर में रहना भी तनाव देता है। जिस दिन से जेल गए, उसी समय से अवसाद में चले गए। जेल में रोकर ही रातें बीती। घर वाले अलग परेशान थे। किसी तरह से जमानत हुई, मगर जो इज्जत गई, उसे कौन लौटाएगा। प्रशासनिक अफसर हो या पुलिस, वह तो एक शब्द में बोल देते हैं गलती हो गई, मगर हम लोगों पर क्या बीती है, उसे बता नहीं सकते हैं।
रामहित, छपरा
पूरी इज्जत ही मिट्टी में मिला दी, दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए
भाई रामचंद्र, भतीजा आबकारी सिपाही विजय प्रताप और पट्टीदार विनोद चौधरी एक साथ जेल भेजे गए थे। उनका कहना है कि पूरी प्रक्रिया के बादशस्त्र लाइसेंस बनवाए थे। सारी जानकारी देने के बाद भी कोई सुनने को तैयार नहीं हुआ। थाने में बंद कर दिया गया। पूरी इज्जत ही चली गई। घरवाले परेशान थे, मगर मैंने सोचा कि चुप नहीं बैठूंगा और मुख्यमंत्री तक शिकायत की। तब जाकर आज बेगुनाह साबित हो पाए। भतीजा विजय प्रताप भी जेल जाने की वजह से आबकारी विभाग से सस्पेंड कर दिया गया था। इस अपमान की भरपाई तो संभव नहीं है, लेकिन कम से कम इस मामले में ऐसे दोषी अफसरों पर कार्रवाई हो जिनकी गलती से यह सब हुआ। तभी उन्हें एहसास होगा कि आखिर किसी बेगुनाह को जेल भेजने से उस पर और उसके घरवालों पर क्या गुजरती है।
किशन चंद्र वर्मा, जंगल रामलखना
दूसरों को शिक्षा देता था, खुद फंसा तो बदहवास हो गया
रिटायर्ड शिक्षक हूं। जिंदगी भर बच्चों को गलत ना करने की शिक्षा ही मैंने दी। सबको सुधारा, खुद कभी कोई छोटी सी भी गलती नहीं की। चौकी, थाने पर जिंदगी भर नहीं गया था। अचानक सत्यापन के नाम पर थाने से बुलाया गया तो डर लगने लगा। वहां गए तो अपराधी की तरह बंद कर दिया गया। मैं बताता रहा कि प्रक्रिया पूरी कर असलहा लाइसेंस लिया था। कई बार असलहा थाने में जमा भी किया था, मगर किसी ने एक नहीं सुनी। समाज में जो प्रतिष्ठा गुरू के तौर पर बनाई थी, वही मेरी जिंदगी भर की कमाई थी, उसे ही लूट लिया गया है। क्या कहूं आज भी उस सदमे से उबर नहीं पाया हूं। किस तरह से रात जेल में कटी है, बता नहीं सकता हूं। खुद को सही साबित करने के लिए दौड़ना पड़ा, वह अलग से मानसिक यातना बनी।
रामनयन, नवां अव्वल
गालियां सुनीं, अपराधी की तरह व्यवहार किया गया
ट्रेजरी में बाबू हूं। जिस दिन थाने पर बुलाया गया उस दिन सरकारी कागजात लेकर कैंपियरगंज जाना था। कई बार थाने पर बोला कि मैं सरकारी काम निपटा कर चला आऊंगा। आखिर कहां भाग जाता मैं, लेकिन अपराधी की तरह व्यवहार किया गया। गालियां दी गईं। ऐसा लगा कि किसी कत्ल के आरोप में आया हूं। नौकरी से भी सस्पेंड हो गया था। हालांकि बाद में डीएम को जानकारी हुई तो उन्होंने सही पाए जाने पर बहाल कराया। आसपास के लोग भी ऐसे देखते जैसे वास्तव में सरकारी नौकरी के दम पर मैंने कोई फर्जीवाड़ा किया हो। मानसिक, सामाजिक हर तरह की यातना सहनी पड़ी है। आज यह बताया जा रहा है कि सब सही है। आखिर फिर जेल क्यों भेजा गया था?
रामनिवास, जंगल चंवरी
डॉक्टर साहब से अपराधी बना दिया, क्लीनिक नहीं आता था
इलाके में बड़े सम्मान की नजर से लोग देखते थे। जब जेल भेजा गया तो उस चौराहे पर भी यही चर्चा थी कि फर्जी लाइसेंस वाले डॉक्टर साहब। यानी पूरी पहचान ही बदल दी गई मेरी। जितने दिन भी जेल में रहा घरवालों ने ठीक से खाना नहीं खाया। एक बारगी तो मेरे कई करीबियों को भी यह लगने लगा था कि मैंने ही कोई गलती की है। सच मानिए समाज, घर सबको समझाना पड़ा। आज भी लोग ऐसे ही देखते ही जैसे अपराधी हूं। कई दिनों तक क्लीनिक पर नहीं आया। किसी तरह से मानसिक रूप से स्वस्थ हो पाया हूं। मेरी जो इज्जत गई उसकी भरपाई तो नहीं हो सकती, लेकिन ऐसा करने वालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, तभी मन को थोड़ी शांति मिलेगी।
डॉ. महताब आलम, जंगल चौरी
विशेषज्ञों की बात
किसी को भी उस जुर्म की सजा देना जो उसने किया ही नहीं, आदमी को मानसिक रोगी बना सकता है। यह मेंटल ट्रॉमा का केस हो जाता है। इस तरह के मरीज आत्महत्या तक कर सकते हैं। क्योंकि जेल जाना किसी के लिए बड़ी यातना है और सज्जन आदमी इसे बर्दाश्त नहीं कर पाते ।
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डॉ. गोपाल अग्रवाल, वरिष्ठ मानसिक रोग विशेषज्ञ
दर्ज करा सकते हैं धारा 342 के तहत केस
किसी को भी गलत तरीके से जेल भेजना कानूनन अपराध है। ऐसे मामले में पीड़ित चाहे तो आरोपियों के खिलाफ धारा 342 ;गलत तरीके से संरक्षण में रखना के तहत केस दर्ज करा सकता है। जिसमें सजा और जुर्माने का प्रावधान है। इसके अलावा मानसिक यातना के लिए भी कोर्ट के जरिए दोषी अधिकारियों को आरोपित बनाया जा सकता है।
कृष्ण बिहारी दुबे, पूर्व अध्यक्ष, बार एसोसिएशन, गोरखपुर
फोटो जर्नलिस्ट::::: शिवहर्ष द्विवेदी
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