गोरखपुर। षष्ठी तिथि भले ही दो दिन दूर है, लेकिन छठ व्रत की तैयारियां अभी से शुरू हो गई हैं। श्रद्धालु घाटों की सफाई करने में जुट गए हैं। चतुर्थ दिवसीय छठ पर्व के तीसरे दिन शाम को अस्ताचल एवं चौथे दिन सुबह उदयाचल सूर्य को अर्घ्य देने का विधान है।
आचार्य शरद चंद्र मिश्र बताते हैं कि चतुर्थ दिवसीय यह पर्व 27 से शुरू होकर 30 अक्टूबर को समाप्त होगा। 27 (कार्तिक शुक्ल चतुर्थी) को पर्व आरंभ होगा। 27 को स्नान आदि से निवृत्त होकर कद्दू भात बनाकर भोजन किया जाता है। 28 को खरना के दिन उपवास करके व्रती महिलाएं किसी तालाब या नदी में स्नान करती हैं। इस दिन नमक रहित यानी मीठा भोजन करती हैं। 29 को डाला छठ यानी षष्ठी के दिन प्रात: काल स्नान के बाद संकल्प किया जाता है। संकल्प के बाद दिन भर निराहार व्रत करके सायंकाल किसी नदी या तालाब पर जाकर स्नान करके पवित्रता पूर्वक भगवान भाष्कर को अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद रात्रि जागरण के बाद 30 को प्रात:काल दोबारा भगवान भाष्कर को अर्घ्य देने के साथ व्रत का पारण होता है।
अर्घ्य का समय
29 अक्टूबर को शाम 5.35
30 अक्टूबर को सुबह 6.36
अर्घ्य का तरीका
बांस के सूप में केला समेत विविध प्रकार के फल, नमक रहित प्रसाद, ईंख आदि रखकर इसे पीले वस्त्र से ढक दिया जाता है। धूप, दीप जलाकर माता षष्ठी देवी को अर्पित किया जाता है। तीन बार अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। रात्रि जागरण के पश्चात उगते हुए सूर्य को इसी भांति अर्घ्य प्रदान किया जाता है। अर्घ्य दूध या पानी से देने का विधान है। पति, पुत्र या ब्राह्मण अर्घ्य दिला सकते हैं। इनके न रहने पर व्रती महिलाएं स्वयं भी अर्घ्य दे सकती हैं।
व्रत का महात्म्य
इस व्रत को सर्वप्रथम च्यवन मुनि की पत्नी सुकन्या ने अपने जराजीर्ण एवं अंध पति के आरोग्य के निमित्त किया था। इस व्रत के प्रभाव से च्यवन को नेत्र ज्योति प्राप्त हुई और वह बूढ़े से जवान हो गए थे। श्रीराम चंद्र जी ने राज्याभिषेक के बाद सीता जी के साथ यह व्रत किया था। इसके फलस्वरूप उन्हें लव और कुश पुत्र रूप में प्राप्त हुए। द्रौपदी ने भी अज्ञातवास के दौरान राजपाट की पुन: प्राप्ति की मनोकामना से संकल्प के साथ यह व्रत किया था। मनु के पुत्र राजा प्रियव्रत पहले निसंतान थे। महर्षि कश्यप के परामर्श से पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ किया। उन्हें पुत्र तो प्राप्त हुआ लेकिन वह मृत था। उस समय वह विलाप करने लगे। आकाश से षष्ठी देवी अवतरित हुईं और उन्हें डाला छठ व्रत रखने के लिए कहा। इस व्रत के बाद राजा को सुंदर और मेधावी पुत्र की प्राप्ति हुई थी।