गोरखपुर।
पूर्वांचल को औद्योगिक विकास की ऊंचाई तक ले जाने का जो सपना पूर्व मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने 1989 में देखा था, वह परवान नहीं चढ़ सका। अफसरों की काहिली और नाकरेपन की वजह से गोरखपुर औद्योगिक विकास प्राधिकरण (गीडा) को पूरी तरह से विकसित करने, उद्यमियों को सुविधा, संसाधन मुहैया कराने का काम कोसों दूर है। सेक्टर 13 और 5 की सड़कें बेहद खराब हैं। बिजली और पानी का जबरदस्त संकट है। लगता है कि किसी अविकसित मोहल्ले में औद्योगिक इकाइयां स्थापित करा दी गई हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने नोएडा को बसाने, सजाने और संवारने का जो सपना देखा था, वह पूरा हुआ लेकिन उनके गृह जनपद में औद्योगिक क्षेत्र बदहाल है। पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने 1991 में गीडा की नींव डाली। तेजी से काम भी हुआ लेकिन अधिकारियों की लालफीताशाही ने पलीता लगा दिया। अफसर आए और वेतन लेकर चले गए लेकिन गीडा का हाल जस का तस रह गया। तमाम प्लाट खाली पड़े हैं, जिनमें बड़ी-बड़ी घास उगी हैं। सेक्टर 15 के ज्यादातर प्लाट खाली हैं। ऐसा लगता है कि ऊसर भूमि पर घास उग आई है। गीडा से गोरखपुर शहर का लिंक भी अच्छा नहीं है। रुस्तमपुर चौराहे से गीडा तक जो सड़क बनी है, उस पर हिचकोले खाते हुए जाना पड़ता है। सड़कों में तमाम जगह जर्क है। परिवहन की अच्छी सुविधा नहीं है।
छोटी-बड़ी 400 इकाइयां, रोजगार सृजन में पिछड़ा
गीडा की स्थापना के करीब 25 साल पूरे हो गए, फिर भी छोटी-बड़ी 400 औद्योगिक इकाइयां स्थापित हो सकी हैं। इनके प्रोडक्शन कोई खास नहीं हैं। रोजगार सृजन के मामले में भी गीडा पीछे है। चैंबर ऑफ इंडस्ट्री के आंकड़ों की मानें तो करीब 9000 कारीगर काम करते हैं। इंजीनियर, मैनेजर की संख्या बेहद कम है। इसके मुकाबले नोएडा बहुत आगे है। नोएडा रोजगार का प्रमुख केंद्र बन चुका है। औद्योगिक इकाइयों को प्रोडक्शन भी जबरदस्त है। अब यूपी में भाजपा की सरकार बनी है। गोरक्ष पीठाधीश्वर महंत योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री हैं। ऐसे में औद्योगिक क्षेत्र के दिन बहुरने की उम्मीद जताई जा रही है। चैंबर ऑफ इंडस्ट्री का कहना है कि अगर सार्थक पहल हुई तो गीडा को पूर्वांचल का औद्योगिक हब बनाया जा सकता है।
जॉब के लिए बाहर जाते हैं युवा
गीडा में महज पांच फीसदी बड़ी औद्योगिक इकाइयां हैं। 95 फीसदी सूक्ष्म, लघु और माध्यम औद्योगिक इकाइयां स्थापित की गई हैं। ज्यादातर इकाइयां फूड प्रोडक्ट्स, टेक्सटाइल, प्लास्टिक और आयरन एंड स्टील से संबंधित हैं। आईटी की एक भी इंडस्ट्री नहीं है, जो रोजगार बढ़ाती है। इसी का नतीजा है कि गोरखपुर या फिर पूर्वांचल के दूसरे जिलों के युवाओं को नोएडा, दिल्ली या फिर एनसीआर के अन्य जिलों में जाकर जॉब करना पड़ता है।
लैंड बैंक जीरो, फंसा विस्तार
गीडा डेवलपमेंट प्लान 2012-32 को बोर्ड की मंजूरी मिल गई है। इसके तहत क्षेत्र का विस्तार 4000 एकड़ किया जाएगा। 76 गांवों के जमीन अधिग्रहण की मंजूरी भी मिली लेकिन रफ्तार बेहद धीमी है। अधिग्रहण काम ठप है। इसका असर है कि गीडा का लैंड बैंक जीरो हो गया। बीपीसीएल के बॉटलिंग प्लांट, निजी मेडिकल कॉलेज खोलने, साइंस सिटी सहित कई संस्थागत, औद्योगिक इकाइयों के लिए जमीन नहीं मिल पा रही है। गीडा की स्थापना के समय यहां 10 हजार एकड़ जमीन उपलब्ध कराने की बात कही गई थी लेकिन अब तक करीब ढाई हजार एकड़ जमीन मिली है। साढ़े सात हजार एकड़ जमीन की तलाश लंबे समय से चल रही है।
स्थायी सीईओ एक साल से नहीं
गीडा के सीईओ का पद पिछले एक साल से खाली है। यह काम जीडीए उपाध्यक्ष ओएन सिंह देख रहे हैं। वह गीडा बोर्ड की मीटिंग में हिस्सा लेते हैं लेकिन पर्याप्त समय नहीं दे पाते हैं। इस कारण कामकाज बाधित होता है।
सीएम तक पहुंची हैं समस्याएं
औद्योगिक इकाई और उद्यमियों की समस्या सीएम योगी आदित्यनाथ तक पहुंच चुकी हैं। इस सिलसिले में चैंबर ऑफ इंडस्ट्रीज के पदाधिकारियों ने मुख्यमंत्री से लखनऊ में मुलाकात भी की थी। पदाधिकारियों ने स्थायी सीईओ की तैनाती की मांग रखी। साथ ही सड़क, बिजली और पानी की समस्या को दूर कराने का अनुरोध किया।
गीडा प्रशासन ने जो नीतियां बनाईं, उसमें उद्योग, उद्यमियों का ध्यान नहीं रखा गया। सिर्फ अपना हित देखा गया। 25 साल पूरे हो गए, फिर उद्यमियों को नोएडा, ग्रेटर नोएडा जैसी सुविधाएं नहीं मिल सकीं। सिंगल विंडो सिस्टम नहीं है। नक्शा पास कराने में छह महीने लग जाते हैं। इसके विपरीत नोएडा डेवलपमेंट अथारिटी एक महीने में नक्शा पास कर देती है। औद्योगिक क्षेत्र की सड़कें बेहद खराब हैं। बिजली, पानी का इंतजाम भी नाकाफी है।
- आरएन सिंह, महामंत्री, चैंबर ऑफ इंडस्ट्रीज
गीडा में भ्रष्टाचार चरम पर है। इसी वजह से विकास की रफ्तर धीमी है। तमाम अफसरों ने स्वार्थवश अपने अधिकारों का इस्तेमाल प्रयोग किया। उद्यमियों की जगह भू-माफियाओं को प्लाट बेच डाला। इसका एक उदाहरण अभी सामने आया है। 83 प्लाटों के आवंटन भी निरस्त हुए हैं। इस मनमानी का खामियाजा तमाम उद्यमियों या फिर औद्योगिक इकाइयों को भुगतना पड़ा। इससे भरोसा टूटा और तमाम उद्यमी नोएडा चले गए। लखनऊ इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथारिटी (लीडा) से प्लाट खरीद लिया। चैंबर ऑफ इंडस्ट्रीज के लोगों को पहले बोर्ड मीटिंग में बुलाया जाता था, जो अब बंद है। समस्या बताने का अब कोई दूसरा तरीका नहीं है।
- एसके अग्रवाल, पूर्व अध्यक्ष चैंबर ऑफ इंडस्ट्रीज