गौराचौकी/गोंडा। आधुनिक तकनीक और बदलते दौर ने त्योहार मनाने के पारंपरिक तौर तरीकों में भी बदलाव लाना शुरू कर दिया है। इस बार बकरीद (ईद-उल-अजहा) के मौके पर लोग तपती धूप में बकरा मंडियों के चक्कर लगाने की जगह स्मार्टफोन से एक क्लिक पर बकरों की फोटो और वीडियो देखकर घर बैठे कुर्बानी के लिए बकरा खरीद रहे हैं। व्यापारी भी कुछ ज्यादा कीमत पर इन बकरों की होम डिलीवरी दे रहे हैं।
खरीद बदले ट्रेड कइस साल बकरा हलाल, गोट्सकार्ट और ओएलएक्स जैसी वेबसाइट्स के साथ-साथ फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप ग्रुप्स पर ऑनलाइन बकरा मंडियां सज गई हैं। व्यापारी बकरों की नस्ल, उम्र, वजन और दांतों की स्थिति के साथ उनका वीडियो और फोटो अपलोड कर रहे हैं। ग्राहक घर बैठे ही अपनी पसंद और बजट के अनुसार बकरा खरी रहे हैं। नगर के शहबाज अहमद ने बताया कि इस बार व्हाट्सएप ग्रुप पर भी बकरे की खरीद-बिक्री हो रही है। उन्होंने 17 किलो का बकरा 21 हजार रुपये में खरीदा है।
बकरीद में सिर्फ दो दिन बचा है और बकरे की मंडियों में खरीद-बिक्री चरम पर पहुंच गई है। क्षेत्र में इस बार बकरीद पर एक करोड़ रुपये से ज्यादा के बकरे के व्यापार का अनुमान है। गोंडा में लखनऊ, सिद्धार्थनगर, बलरामपुर, बस्ती तथा मध्य प्रदेश के कालपी और राजस्थान से बकरा आ रहे हैं। इनमें टोटापुरी, राजस्थानी, बरबरा, जमुनापारी और देशी नस्ल की सबसे ज्यादा मांग है। 20 किलो से 60 किलो तक के बकरे मंडी में मौजूद हैं। व्यापारी मोहम्मद रियाज ने बताया कि इस बार दाम 20-30 प्रतिशत तेज है। 20-25 किलो का बकरा 20-25 हजार में बिक रहा है। 40-50 किलो का बकरा 50-60 हजार में जा रहा है। वहीं 100 किलो से ऊपर के खास बकरे 80 हजार से 2 लाख तक में बिक रहे हैं। गोंडा के बकरा बाजार में रविवार को ‘टुनटुन मुनमुन’ नामक बकरा 1.35 लाख में बिका था।
बकरों की मुंह मांगी कीमत
- आम दिनों के मुकाबले बकरीद में कुर्बानी के बकरों की कीमत 25 से 30 प्रतिशत तक बढ़ गई है। कुर्बानी के लिए बकरों में शर्त है कि या तो एक वर्ष पूर्ण कर चुका हो या फिर उसके मुंह में दो दांत निकल आए हों। ऐसे बकरों की बाजार में कमी रहती है इसलिए त्योहार पर उनकी कीमत बढ़ जाती है।
युवाओं का बदला नजरिया
बकरीद पर कुर्बानी की परंपरा तो पुरानी है, लेकिन पिछले 5-7 साल में युवाओं के बीच इसका तरीका और नजरिया काफी बदला है। नौजवानों में कुर्बानी का जज्बा कम नहीं हुआ है लेकिन बढ़ती महंगाई को देखते हुए नौजवान नस्ल कम बजट ज्यादा हाइजीन और सामूहिक भागीदारी पर जोर दे रहा है। परंतु सभी ऐसे नहीं है कुछ नौजवान सुल्तान, शेरू, टुनटुन मुनमुन जैसे नामी बकरों को लाखों में खरीद रहे हैं।