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डॉक्टरों के कमीशन के चक्कर में दम तोड़ रहे प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र

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गोंडा के आंबेडकर चौराह स्थित जन औषधि केंद्र पर खाली बैठा संचालक - फोटो : GONDA
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गोंडा। आम आदमी को सस्ती कीमत की दवा मुहैया कराने के लिए संचालित किए जा रहे जन औषधि केंद्र कारगर साबित नहीं होते दिख रहे। सरकारी अस्पतालों में चल रहे डॉक्टरों के कमीशन के खेल में जन औषधि केंद्रों पर नाम मात्र के खरीददार ही दवा लेने को पहुंचते हैं।
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इसका कारण है कि डॉक्टर जेनरिक दवाएं लिखने से पहेज बरतते हैं। इसके चलते मरीजों को मेडिकल स्टोरों के लिए लिखी जाने वाली मंहगी दवाएं खरीदने को मजबूर होना पड़ता है। इससे परेशान जन औषधि केंद्र संचालक अब दुकान का किराया तक न निकल पाने की बात कहकर दवा बिक्री लाइसेंस को वापस करने को मजबूरी बताने लगे हैं।
प्रधानमंत्री ने गरीबों को बाजार भाव से लगभग पांच गुना कम दर में जीवन रक्षक दवाएं उपलब्ध कराने के पीएम जन औषधि केंद्र की योजना को देश भर में शुरू कराया था। इन दवा दुकानों पर सरकार की ओर से बाजार भाव से करीब पांच से छह गुुना कम रेट पर 600 तरह की जेनरिक दवाएं बिक्री को मुहैया कराई जाती है।
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ताकि आम लोगों को महंगी दवाओं के बोझ तले दबना न पड़े। सरकार की योजना पर दवाओं की आड़ में चलता सरकारी व निजी डॉक्टरों का कमीशन का खेल पलीता लगा रहा है। जन औषधि योजना के तहत जन औषधि केंद्रों का संचालन शुरू हो जाने के बाद भी निजी व सरकारी सेवा में कार्यरत डॉक्टरों ने कमीशनखोरी के चलते जेनरिक के बजाए ब्रांडेड दवाएं लिखना जारी रखा है।
इससे जन औषधि केंद्रों का खर्चा तक नहीं निकल पा रहा। इसके चलते संचालित केंद्र अब बंद होने की कगार पर पहुंचने लगे हैं। आंबेडकर चौराहा स्थित जन औषधि केंद्र के संचालक सुनील उपाध्याय ने बताया कि डॉक्टर जेनरिक दवाएं नहीं लिख रहे हैं और यदि कोई मरीज लेकर जाता है तो उसे भी वापस करवाकर अधिक कमीशन वाली ब्रांडेड दवाएं खरीदने को कहते हैं। इसके चलते गरीब मरीजों को सस्ती दर की दवा का लाभ भी नहीं मिल पा रहा है।
जन औषधि केंद्रो पर शुरूआत में मरीजों की लंबी कतार लगती थी। औषधि केंद्र 24 घंटे खोले जाने का निर्देश भी था। जिला अस्पताल व महिला अस्पताल के पास बने केंद्रो पर मरीजों का तांता लगा रहता था लेकिन धीरे-धीरे सन्नाटा हो गया।
केंद्र पर बैठे सेल्समैन ने बताया कि बीच में दवाओं की सप्लाई भी कम हो गई जिससे यहां मौजूद तीन सौ से अधिक तरह की दवाएं खत्म होने लगीं। मौजूदा वक्त में यहां लगभग 40 से 50 तरह की दवाएं ही बची हैं, उनमें भी अधिकांश वो दवाएं हैं, जिन्हें जिला अस्पताल के चिकित्सक नहीं लिखते।
इन औषधि केंद्रों पर दवा बिकने के बाद उसकी कीमत दवा सप्लाई करने से जुड़ी संस्था को दी जाती है। केंद्रों से दवा बिक्री कम होने के कारण पुराना भुगतान अटक जाने के कारण दवा सप्लाई से जुड़ी संस्थाओं ने भी इन केंद्रों को नयी दवा की सप्लाई देना बंद कर दी है। दवा सप्लाई से जुड़ी संस्थाओं के लोगों का कहना अब नकद दवा खरीदने पर ही सप्लाई संभव हो सकती है।
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