गोंडा। हृदय रोगियों के इलाज के लिए जरूरी जांच में इस्तेमाल होने वाली टीएमटी व टू-डी इको मशीनें स्वास्थ्य अधिकारियों की लापरवाही सेे जिला अस्पताल में बिना उपयोग ही कबाड़ होने की स्थिति में पहुंच गयी है। 15 साल पहले खरीदी गयी इन दोनों मशीनों की खरीद के बाद अस्पताल प्रशासन इन दोनों मशीनों को उपयोग में लाना ही भूल चुका था।
अमर उजाला ने 21 नवंबर के अंक में 15 साल से गायब टीमएटी और टू-डी इको मशीन के मामले को प्रमुखता से उठाया था। इसके बाद हरकत में आए स्वास्थ्य महकमे के अफसरों ने खरीदी गयी टीएमटी मशीन को तो आनन-फानन ढूंढ कर अब इसे कंडम घोषित करने की तैयारी शुरू कर दी है। वही टू-डी इको मशीन की खरीद न होने की बात कही जा रही है। जांच के लिए जरूरी इन दोनों मशीनों के न होने से मरीजों के इलाज में काफी परेशानी हो रही है।
वर्ष 2005 में हृदय रोगियों की जांच के लिए जिला अस्पताल के क्षेत्रीय निदान केंद्र में जांच के लिए टू डी इको व टीमएटी मशीन की खरीद हुई थी। लगातार इंतजार के बाद भी अस्पताल में इन दोनों मशीनों को क्रियाशील तक नहीं किया गया।
बाद में यह दोनों मशीनें अस्पताल से गायब हो गईं। अमर उजाला ने 21 नवंबर के अंक में जब जांच के लिए खरीदी गयी दोनों मशीनों के गायब होने का खुलासा किया तो एक बार फिर नए सिरे से इनकी खोज शुरू हुई।
अब जिला अस्पताल के प्रमुख अधीक्षक डॉ घनश्याम सिंह बताते हैं कि 16 साल पहले टीएमटी जांच को जो मशीन खरीदी गयी थी वह प्रयोग न हो पाने के कारण अब कंडम होने की स्थिति में है। जबकि टू डी इको मशीन की खरीद अभी तक सामने नहीं।
ठंड बढ़ने से साथ हृदय रोग से पीड़ित मरीजों की भीड़ भी अस्पतालों में बढ़ने लगी है। जिला अस्पताल की ओपीडी में हर रोज करीब 20 से 30 रोगी दिल की बीमारी से तकलीफ के आते हैं।
जिला अस्पताल में आने वाले इन हृदय रोगियों को टीएमटी व टू डी इको जांच के लिए बाहर से दो से ढाई हजार खर्च कर जांच करानी पड़ती है। इसके साथ ही जिला अस्पताल में पिछले दो सालों से हृदयरोग विशेषज्ञ की तैनाती भी नहीं है।
इससे मरीजों का इलाज मेडिसिन विभाग के फिजीशियन के भरोसे ही रहता है। ऐसे में जरा सा भी गंभीर होने पर मरीज को दूसरी जगह रेफर कर दिया जाता है। वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. समीर गुप्ता ने बताया कि हार्ट की नसों में ब्लॉकेज का पता लगाने के लिए टीएमटी (ट्रेडमिल टेस्ट) कराना जरूरी होता है। टेस्ट के दौरान मरीज का ईसीजी मॉनिटर किया जाता है जबकि टू-डी इको कार्डियोग्राफी का प्रयोग दिल की संरचनाओं की वास्तविक गति को देखने के लिए किया जाता है।
जिला अस्पताल में खराब पड़ी एक्सरे मशीन भी मरीजों की परेशानी को बढ़ा रही है। इससे इलाज के लिए आने वाले हड्डी विभाग के मरीजों को एक्स-रे करवाने के लिए निजी केंद्रों की दौड़ लगाकर परेशाना होना पड़ता है। एक्सरे टेक्नीशियन अशोक सिंह का कहना है कि कोविड अस्पताल में एक मशीन से लोगों का एक्सरे किया जा रहा है। यहां एक्सरे मशीन ठीक कराने के लिए इंजीनियर को बुलाया गया है।