गोंडा। श्रमिकों को गांवों मेें ही काम देने के लिए मनरेगा से भले ही 175 करोड़ रुपये की योजनाएं चल रही हैं, मगर इसके बाद भी शहर के दो चौराहों पर गांवों के श्रमिकों की बोली लगती है। लोग मोलभाव करके मजदूरों को काम कराने के लिए ले जाते हैं। मगर ये मजदूरी की रकम किसी भी सूरत में मनरेगा द्वारा निर्धारित एक दिन की दिहाड़ी 213 रुपये से अधिक होती है। यही वजह से है कि जॉब कार्ड धारक गांव में मनरेगा के काम करने के बजाय शहर की लेबर मंडी जाना अधिक फायदेमंद समझते हैं। जहां उन्हें 350 से 450 रुपये तक दिहाड़ी मजदूरी मिल जाती है। भुगतान भी तुरंत होता है, जबकि मनरेगा में काम करने के बाद भुगतान के लिए चक्कर काटने पड़ते हैं।
सुबह छह बजे से ही शहर के पीपल चौराहे पर मजदूरों का जुटना शुरू हो जाता है। मजदूरी के लिए जैसे ही कोई ठेकेदार या व्यक्ति आता है तो मजदूर आशा भरी नजरों से दौड़ पड़ते हैं। यहां मिस्त्री यानी कुशल मजदूर और श्रमिक दोनों मिलते हैं। इसके बाद मोलभाव शुरू होता है। लोग मजदूरी तय करके श्रमिकों को लेकर चले जाते हैं। यहां मिस्त्री का कार्य करने वाले श्रमिकों को छह सौ से सात सौ रुपये तक की मजदूरी एक दिन में मिलती है। वहीं, मजदूरी करने वालों को 350 से 450 रुपये तक मजदूरी मिलती है। इसी तरह बड़गांव के पास भी सुबह से ही मजदूर एकत्र होते हैं। वहां भी उनकी बोली लगती है। मजदूरी तय होने के बाद श्रमिक काम पर चले जाते हैं। जिले में साल 2008 से मनरेगा योजना लागू है। इसके बावजूद आज भी मजदूरों की बोली लगने की परंपरा जारी रहना चौंकाने वाला है।
जिले में मनरेगा से साल भर में 176 करोड़ रुपये का बजट खर्च होना है। इसके अलावा पंचायतीराज विभाग से भी 200 करोड़ से अधिक के विकास कार्य संचालित होते हैं। पीडब्ल्यूडी व सिंचाई विभाग के बजट पर भी गौर करें तो दो हजार करोड़ तक की योजनाएं संचालित हो रहीं हैं। इसके बाद भी जिले में श्रमिकों को लेबर मंडी जाना पड़ता है। जिले में मनरेगा में पंजीकृत श्रमिक ही 3.93 लाख श्रमिक हैं। इनके भी रोजगार का इंतजाम न होना चौंकाने वाला है। अन्य विभागों की योजनाएं भी कारगर नहीं दिख रहीं हैं। इस बार तो मार्च 2023 तक 51 लाख मानव दिवसों का सृजन किया जाना है।
श्रमिकों की काम की तलाश पूरी नहीं होती है। हर दिन करीब एक हजार श्रमिक शहर के बड़गांव और पीपल चौराहे पर एकत्र होते हैं। ये पूरे दिन काम करते हैं और मजदूरी करके घर जाते हैं। इसके अलावा गांवों के ही हजारों लोग शहर में रिक्शा, फल, सब्जी आदि का भी काम करके जीवनयापन करते हैं। इन्हें पंचायतों में रोजगार देने के लिए कोई इंतजाम नहीं है। ज्यादा श्रमिक शहर से सटे 27 गांवों के हैं, जहां मनरेगा से कार्य काफी प्रभावित हैं। इनको न तो शहर में शामिल किया गया है और न ही गांवों जैसी योजनाएं ही यहां ठीक से संचालित हो पा रहीं हैं। ऐसे में इन गांवों के लोगों के समक्ष रोजगार का संकट अधिक है।
सीडीओ गौरव कुमार का कहना है कि ग्राम पंचायतों में रोजगारपरक योजनाओं को गंभीरता से संचालित किया जाएगा। अभी विभाग की योजनाओं की समीक्षा की जा रही है, जल्द ही सुधार दिखेगा।