फोटो- 2- गोंडा के पसका सूकरखेत में मकर संक्रांति पर मंदिर में लगा ताला, पसरा सन्नाटा। संवाद
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परसपुर (गोंडा)। पौराणिक मान्यताओं को सहेजे भगवान वाराह की औतार स्थली पर मकर संक्रांति पर भी सन्नाटा पसरा रहा। 17 जनवरी को होने वाला ऐतिहासिक मेला इस बार नहीं होगा। कोरोना के कारण मेले का आयोजन स्थगित कर दिया गया है। अवध के चौरासी कोसी परिक्रमा मार्ग में अवस्थिति तथा लघु प्रयाग के नाम से विख्यात पसका, सूकरखेत में देश विदेश के नागा, साधु-सन्यासी हांड़ कंपाऊ भीषण ठंड के बावजूद कल्पवास-तपस्या में लीन रह कर अपना नाता पारब्रह्म परमेश्वर से जोड़े हुए हैं।
मकर संक्रांति पर कल्पवास स्थल पर पतित पावनी मां सरयू की रेती पर साधु-संतों व गृहस्थों के पंडालों में श्रद्धालु भंडारे का आयोजन कर रहे हैं। प्रसाद ग्रहण करने व दान पुण्य के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है। चारों तरफ माहौल भक्ति भाव से परिपूर्ण है। हर तरफ सिर्फ रामधुन सुनाई पड़ रहा है। मकर संक्रांति के अवसर पर श्रद्धालुओं ने त्रिमुहानी घाट पर स्नान कर घाटों पर ही पंडों को दान पुण्य कर पुण्य लाभ अर्जित किया।
सूकरखेत में ही पृथ्वी को वाराह भगवान ने कराया था मुुक्त
मान्यता है कि इसी स्थान पर भगवान विष्णु ने पृथ्वी को मुक्त कराने के लिये वाराह का रूप धारण कर हिरण्याक्ष नामक राक्षस का वध किया था। इस तपोस्थली को सूकरखेत या वाराह क्षेत्र कहा जाता है। धार्मिक स्थली को लोग स्वर्ग की भी संज्ञा देते हैं। पवित्र सरयू नदी के तट पर बड़ी संख्या में नागा, साधु - संयासी तथा गृहस्थों ने सांसारिक सुख सुविधाओं को तिलांजलि देकर फूस की कुटिया डाल कर कल्पवास-तपस्या में लीन रहते हैं। मंदिर में भगवान सूकर की प्रतिमा स्थापित की गई थी। श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र हुआ करती थी। जो करीब 36 वर्ष पूर्व 1985 में कीमती चोरी चली गई थी। जिसे पुलिस ने खंडित अवस्था कानपुर से बरामद किया था। आज भी गोंडा के मालखाने में रखी हुई है। पसका कोट की सहमति से बाद में सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवा कर नई मूर्ति स्थापित करवाई थी।
राजापुर में गोस्वामी तुलसीदास की जन्मस्थली
पसका, सूकरखेत राजापुर में रामचरित मानस के अमर रचनाकार गोस्वामी तुलसीदास का जन्म स्थान माना जाता है। पसका में तुलसीदास के गुरु नरहरिदास जी का आश्रम आज भी विद्यमान है। मानस के बालकांड में इस स्थान का उल्लेख खुद गोस्वामी जी ने किया है। कहते हैं गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस पुण्य भूमि पर अपने गुरु से दीक्षा ली थी। उनके गुरु के आश्रम में आज भी हस्तलिखित रामायण के पन्ने इस स्थली के ऐतिहासिकता की गवाही दे रहे हैं। आज भी करनैलगंज के राजस्व अभिलेखों में गोस्वामी जी के पिता की खतौनी में नाम दर्ज है। आत्माराम टेपरा का रिकार्ड मौजूद है।