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11 वर्ष की आयु में भगवान घनश्याम ने छोड़ दिया घर

Thu, 10 Nov 2016 11:54 PM IST
अमर उजाला/गोंडा
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छपिया महोत्सव में जुटे भक्त - फोटो : अमर उजाला
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 भगवान घनश्याम ने अपने माता-पिता के देहावसान के बाद 11 वर्ष की आयु में घर का परित्याग कर दिया और वनवास चले गए। इस दौरान उन्होंने करीब साढे़ बारह हजार किलोमीटर की पैदल यात्रा की और अनेक प्रकार के कष्टों का सामना किया। कथावाचक स्वामी नित्य स्वरूपानंद जी महराज ने छपिया महोत्सव के छठे दिन भगवान के वनगमन की कथा सुनाई तो श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।
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भगवान घनश्याम की जन्मस्थली स्वामी नारायण छपिया मंदिर में चल रहे नौ दिवसीय छपिया महोत्सव में गुरुवार को हजारों श्रद्धालुओं ने पवित्र नारायण सरोवर में स्नान किया और भगवान के मंदिर में पूजा-अर्चना की।

इसके बाद प्रथम वेला में कथावाचक स्वामी नित्य स्वरूपानंद जी महराज ने श्रद्धालुओं को भगवान की कथा का रसपान कराते हुए बताया कि जिस समय भगवान घनश्याम ने अपने घर का परित्याग किया, उस समय उनकी आयु महज 11 वर्ष तीन माह थी।
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उन्होंने हिमालय पर्वत से लेकर नेपाल, बांग्लादेश, उड़ीसा, जगन्नाथपुरी व दक्षिण के कन्याकुमारी तक की यात्रा की और इसके बाद वह पश्चिम में पंढरपुर व नासिक पहुंचे। इस यात्रा के दौरान भगवान घनश्याम को कई हिंसक जीव जंतुओं व मायावी राक्षसों का सामना करना पड़ा।

अपने वनवास काल में भगवान ने ठंड, गर्मी, बरसात का सामना किया, कंदमूल खाए, कुछ नहीं मिला तो भूखे प्यासे रहकर अपने मार्ग पर आगे बढ़ते रहे। इस तरह उन्होंने अनेक प्रकार के कष्टों का सामना किया, लेकिन अपने वैराग्य के मार्ग पर अडिग रहे। स्वामी नित्य स्वरूपानंद जी महराज ने कहा कि भगवान ने अपने शरीर को कष्ट देकर पूरी मानव जाति को वैरागी जीवन का दर्शन कराया।

कथा सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो गए और उनकी आंखें छलक आईं। कथा पंडाल में मंदिर के महंत स्वामी वासुदेवानंद जी महराज, स्वामी हरिस्वरूपानंद जी, यजमान आशीष भाई, रमेश भाई मानसेता, हर्षद भाई, निशांत, मोहित सोनी, पीयूष आदि मौजूद रहे। 

माता-पिता की मृत्यु के बाद जब भगवान ने अपना घर छोड़ा तो आसुरी शक्तियों ने उन्हें जान से मारने का प्रयास भी किया। जब वह घर छोड़कर अयोध्या पहुंचे तो सरयू नदी में बाढ़ आई हुई थी। वह नदी के तट पर खड़े होकर नदी को पार करने की सोच ही रहे थे कि किसी आसुरी शक्ति ने उन्हें उठाकर नदी की धारा में फेंक दिया। करीब 12 कोस तक वह नदी में बहते रहे। इसके बाद वह पूर्ण रूप से स्वस्थ अवस्था में नदी से बाहर आए और हिमालय की तरफ प्रस्थान किया। 
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