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गुमनामी के अंधेरे में सेनानी का कुनबा

Sun, 09 Aug 2015 11:08 PM IST
गोंडा/अमर उजाला ब्यूरो
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अगस्त क्रांति पर देश के वीर सपूतों व आजादी के दीवानों को याद करने की परंपरा चली आ रही है। लेकिन जिन सपूतों ने अगस्त क्रांति से लेकर देश की आजादी तक अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया, उन्हें लोगों ने भुला दिया है। इन्हें न तो याद किया जाता है और न ही इनके परिवार की सुध ली जाती है।
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ऐसे दो सपूतों के परिवारीजन आज भी हैं, जो गुमनामी के अंधेरे में गुजर-बसर कर रहे हैं। फूस के घरों में रहकर मजदूरी करते हैं। बच्चे अंग्रेजों के जमाने में भूखे रहते थे और आजादी के 68 वर्ष बाद भी भूखे रह जाते हैं। शासन व प्रशासन की योजनाएं बनती हैं, पर इनके लिए न तो कोई योजना है और न ही इनके परिवारीजनों के बलिदान पर इन्हें याद किया जाता है।

15 अगस्त 1947 की याद को हर बार ताजा कर जश्न मनाया जाता है। 15 अगस्त 2015 पर भी पूरा राष्ट्र जश्न मनाएगा। अपने पिता के बलिदान पर परिवार वालों को भले ही गर्व है, लेकिन जब परिवार के सामने समस्याएं खड़ी हो जाती हैं, तब उन्हें सब कुछ मिथ्या लगने लगता है।
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जिला मुख्यालय से करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित सरैयां माफी गांव में देश के वीर सपूतों के ताम्रपत्र ये दर्शाते हैं कि उन्होंने देश की खातिर अपना जीवन लगा दिया। परंतु उनके परिवारीजनों की पेट की तपन तथा छप्पर के मकान ने आजादी के दीवानों के उद्देश्य को ही भटका दिया है।

सरैयां माफी गांव में जन्मे बाबूराम चौहान ने आजादी की लड़ाई लड़ी। सत्याग्रह आंदोलन और क्विट इंडिया मूवमेंट में बढ़-चढ़कर भाग लिया। जेल गए। 24 मार्च 1995 को वह देश व शरीर छोड़ कर अलविदा हो गए। लेकिन अब उनका परिवार भुखमरी से जूझ रहा है।

भूमि हीन स्वाधीनता सेनानी बाबू राम को तीन बीघा जमीन पट्टे में मिली थी। इसके बाद उनके बड़े पुत्र इसरक दास व अमर सिंह को पांच बीघा जमीन पट्टे में मिली। तीसरे बेटे ननकू को वह भी नहीं मिली। एक मात्र इंदिरा आवास मिला, लेकिन ये परिवार आज मजदूरी कर किसी तरह पेट पालता है।

आज यह परिवार अपने पूर्वज का ताम्रपत्र संजोए एक भट्ठे पर मजदूरी कर रहा है। 1975 में भारत सरकार ने पत्र जारी कर सेनानी बाबूराम चौहान के परिवार को 15 बीघा जमीन खेती के लिए मुहैया कराने का निर्देश जारी किया था।

सेनानी के तीन पुत्रों में दो लोगों को केवल साढ़े आठ बीघा जमीन ही पट्टे पर मिली थी। शेष जमीन आज तक नहीं मिली। यह परिवार आज एक भट्ठा मालिक का कर्जदार है और पूरा कुनबा भट्ठे पर ही मजदूरी करता है।
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